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इशतियाक़ अहमद की बच्चों की कहानियाँ
दादी अम्मां की कहानी
दादी अम्मां सोने से पहले सब बच्चों को कहानी सुनाया करती थीं। हमारे घर में उनकी कहानी सुनने के लिए मुहल्ले के दूसरे बच्चे भी आ जाते। हर-रोज़ रात को हम उनसे कहानी सुनते। उनकी कहानी बहुत मज़े-दार होतीं। हम उन्हें मज़े ले-ले कर सुनते। आख़िर में दादी अम्मां
दादी अम्मां की कहानी
दादी अम्मां सोने से पहले सब बच्चों को कहानी सुनाया करती थीं। हमारे घर में उनकी कहानी सुनने के लिए मुहल्ले के दूसरे बच्चे भी आ जाते। हर-रोज़ रात को हम उनसे कहानी सुनते। उनकी कहानी बहुत मज़े-दार होतीं। हम उन्हें मज़े ले-ले कर सुनते। आख़िर में दादी अम्मां
बचपन की तस्वीर
चलती ट्रेन में चढ़ने वाले नौजवान को नवाब काशिफ़ ने हैरत भरी नज़रों से देखा। वो अंदर आने के बाद अपना साँस दुरुस्त कर रहा था। शायद ट्रेन पर चढ़ने के लिए उसको काफ़ी दूर दौड़ना पड़ा। नवाब काशिफ़ ने उससे कहा, “नौजवान, ट्रेन पर चढ़ने का ये तरीक़ा दुरुस्त नहीं, इस
बचपन की तस्वीर
चलती ट्रेन में चढ़ने वाले नौजवान को नवाब काशिफ़ ने हैरत भरी नज़रों से देखा। वो अंदर आने के बाद अपना साँस दुरुस्त कर रहा था। शायद ट्रेन पर चढ़ने के लिए उसको काफ़ी दूर दौड़ना पड़ा। नवाब काशिफ़ ने उससे कहा, “नौजवान, ट्रेन पर चढ़ने का ये तरीक़ा दुरुस्त नहीं, इस
बिल्लियों की कॉन्फ्रेंस
घर के कबाड़ ख़ाने में बिल्लियों की कान्फ़्रैंस हो रही थी। तमाम बिल्लियां इस तरह एक गोल दायरे में बैठी थीं जैसे किसी गोल मेज़ कान्फ़्रैंस में शिरकत कर रही हूँ। बैठने से पहले उन सबने अपनी अपनी दुम से अपनी जगह भी साफ़ की थी। लक्कड़ी की एक टूटी कुर्सी पर उस वक़्त
बिल्लियों की कॉन्फ्रेंस
घर के कबाड़ ख़ाने में बिल्लियों की कान्फ़्रैंस हो रही थी। तमाम बिल्लियां इस तरह एक गोल दायरे में बैठी थीं जैसे किसी गोल मेज़ कान्फ़्रैंस में शिरकत कर रही हूँ। बैठने से पहले उन सबने अपनी अपनी दुम से अपनी जगह भी साफ़ की थी। लक्कड़ी की एक टूटी कुर्सी पर उस वक़्त
दोस्त दुश्मन
हमारे अंग्रेज़ी के मास्टर साहब ग़ुस्से के बहुत तेज़ थे। इत्तिफ़ाक़ से हम भी अंग्रेज़ी में ही कमज़ोर थे। उनकी आदत थी कि अच्छे भले लायक़ लड़कों को भी छोटी छोटी ग़लतियों पर कान पकड़वा देते थे। फिर हमारी उनसे क्यों ना जान जाती। उनका पीरियड आता तो हमारी टांगें
दोस्त दुश्मन
हमारे अंग्रेज़ी के मास्टर साहब ग़ुस्से के बहुत तेज़ थे। इत्तिफ़ाक़ से हम भी अंग्रेज़ी में ही कमज़ोर थे। उनकी आदत थी कि अच्छे भले लायक़ लड़कों को भी छोटी छोटी ग़लतियों पर कान पकड़वा देते थे। फिर हमारी उनसे क्यों ना जान जाती। उनका पीरियड आता तो हमारी टांगें
सब्ज़परी और अमजद
अमजद बहुत प्यारा गोल मटोल सा लड़का था। वो पांचवीं जमात में पढ़ता था। अपना सबक़ फ़रफ़र सुनाता तो उस्ताद बहुत ख़ुश होते। घर में अपनी अम्मी के कामों में मदद करता तो वो ख़ुश हो कर उसे अपने सीने से चिमटा लेतीं। शाम को उस के अब्बा जान घर आते तो वो दौड़ कर उनसे
सब्ज़परी और अमजद
अमजद बहुत प्यारा गोल मटोल सा लड़का था। वो पांचवीं जमात में पढ़ता था। अपना सबक़ फ़रफ़र सुनाता तो उस्ताद बहुत ख़ुश होते। घर में अपनी अम्मी के कामों में मदद करता तो वो ख़ुश हो कर उसे अपने सीने से चिमटा लेतीं। शाम को उस के अब्बा जान घर आते तो वो दौड़ कर उनसे
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