- पुस्तक सूची 179240
-
-
पुस्तकें विषयानुसार
-
गतिविधियाँ76
बाल-साहित्य1985
नाटक / ड्रामा918 एजुकेशन / शिक्षण343 लेख एवं परिचय1373 कि़स्सा / दास्तान1578 स्वास्थ्य105 इतिहास3273हास्य-व्यंग607 पत्रकारिता201 भाषा एवं साहित्य1707 पत्र736
जीवन शैली30 औषधि976 आंदोलन272 नॉवेल / उपन्यास4285 राजनीतिक354 धर्म-शास्त्र4729 शोध एवं समीक्षा6588अफ़साना2686 स्केच / ख़ाका242 सामाजिक मुद्दे109 सूफ़ीवाद / रहस्यवाद2028पाठ्य पुस्तक450 अनुवाद4243महिलाओं की रचनाएँ5863-
पुस्तकें विषयानुसार
- बैत-बाज़ी14
- अनुक्रमणिका / सूची4
- अशआर68
- दीवान1277
- दोहा48
- महा-काव्य100
- व्याख्या180
- गीत63
- ग़ज़ल1253
- हाइकु12
- हम्द50
- हास्य-व्यंग31
- संकलन1596
- कह-मुकरनी7
- कुल्लियात580
- माहिया20
- काव्य संग्रह4836
- मर्सिया386
- मसनवी747
- मुसद्दस41
- नात575
- नज़्म1189
- अन्य82
- पहेली15
- क़सीदा182
- क़व्वाली17
- क़ित'अ67
- रुबाई272
- मुख़म्मस15
- रेख़्ती12
- शेष-रचनाएं17
- सलाम32
- सेहरा12
- शहर आशोब, हज्व, ज़टल नामा17
- तारीख-गोई26
- अनुवाद74
- वासोख़्त25
राजिंदर सिंह बेदी की कहानियाँ
लाजवंती
लाजवंती ईमानदारी और ख़ुलूस के सुंदरलाल से मोहब्बत करती है। सुंदरलाल भी लाजवंती पर जान छिड़कता है। लेकिन बँटवारे के वक़्त कुछ मुस्लिम नौजवान लाजवंती को अपने साथ पाकिस्तान ले जाते हैं और फिर मुहाजिरों की अदला-बदली में लाजवंती वापस सुंदरलाल के पास आ जाती है। इस दौरान लाजवंती के लिए सुंदरलाल का रवैया इस क़दर बदल जाता है कि लाजवंती को अपनी वफ़ादारी और पाकीज़गी पर कुछ ऐसे सवाल खड़े दिखाई देते हैं जिनका उसके पास कोई जवाब नहीं है।
गरम कोट
यह ऐसे शख़्स की कहानी है जिसे एक गर्म कोट की शदीद ज़रूरत है। पुराने कोट पर पेवंद लगाते हुए वो और उसकी बीवी दोनों थक गए हैं। बीवी-बच्चों की ज़रूरतों के आगे वह हमेशा अपनी इस ज़रूरत को टालता रहता है। एक रोज़ घर की ज़रुरियात लिस्ट बनाकर वह बाज़ार जाता है तो पता चलता है कि जेब में रखा दस का नोट कहीं गुम हो गया है, मगर बाद में पता चलता है कि वह नोट कोट की फटी जेब में से खिसक कर दूसरी तरफ़ चला गया था। अगली बार वह अपनी बीवी को बाज़ार भेजता है। बीवी अपनी और बच्चों की ज़रूरत का सामान लाने की बजाये शौहर के लिए गर्म कोट का कपड़ा ले आती है।
अपने दुख मुझे दे दो
कहानी एक ऐसे जोड़े की दास्तान बयान करती है, जिसकी नई-नई शादी हुई है। सुहागरात में शौहर के दुखों को सुनकर बीवी उसके सभी दुख माँग लेती है। मगर वह उससे कुछ नहीं माँगता है। बीवी ने घर की सारी ज़िम्मेदारी अपने ऊपर ले ली है। उम्र के आख़िरी पड़ाव पर एक रोज़ शौहर को जब इस बात का एहसास होता है तो वह उससे पूछता है कि उसने ऐसा क्यों किया? वह कहती है कि मैंने तुमसे तुम्हारे सारे दुख माँग लिए थे मगर तुमने मुझसे मेरी खुशी नहीं माँगी। इसलिए मैं तुम्हें कुछ नहीं दे सकी।
भोला
मैंने माया को पत्थर के एक कूज़े में मक्खन रखते देखा। छाछ की खटास को दूर करने के लिए माया ने कूज़े में पड़े हुए मक्खन को कुएँ के साफ़ पानी से कई बार धोया। इस तरह मक्खन के जमा करने की कोई ख़ास वजह थी। ऐसी बात उ'मूमन माया के किसी अ'ज़ीज़ की आमद का पता देती थी।
क्वारंटीन
कहानी में एक ऐसी वबा के बारे में बताया गया है जिसकी चपेट में पूरा इलाक़ा है और लोगों की मौत निरंतर हो रही है। ऐसे में इलाके़ के डॉक्टर और उनके सहयोगी की सेवाएं प्रशंसनीय हैं। बीमारों का इलाज करते हुए उन्हें एहसास होता है कि लोग बीमारी से कम और क्वारंटीन से ज़्यादा मर रहे हैं। बीमारी से बचने के लिए डॉक्टर खु़द को मरीज़ों से अलग कर रहे हैं जबकि उनका सहयोगी भागू भंगी बिना किसी डर और ख़ौफ़ के दिन-रात बीमारों की सेवा में लगा हुआ है। इलाक़े से जब महामारी ख़त्म हो जाती है तो इलाक़े के गणमान्य की तरफ़ से डॉक्टर के सम्मान में जलसे का आयोजन किया जाता है और डॉक्टर के काम की तारीफ़ की जाती है लेकिन भागू भंगी का ज़िक्र तक नहीं होता।
वो बुढ्ढा
एक जवान और खू़बसूरत लड़की की कहानी है, जिसकी मुठभेड़ एक रोज़ सड़क पर चलते हुए एक बुड्ढे से हो जाती है। बुड्ढ़ा उसकी खू़बसूरती और जवानी की तारीफ़ करता है तो पहले तो उसे बुरा लगता है लेकिन रात में जब वह अपने बिस्तर पर लेटती है तो उसे तरह-तरह के ख़्याल घेर लेते हैं। वह उन ख़्यालों में उस वक़्त तक गुम रहती है जब तक उसकी मुलाक़ात अपने होने वाले शौहर से नहीं हो जाती।
एक बाप बिकाऊ है
कहानी अख़बार में छपे एक इश्तिहार से शुरू होती है जिसमें एक बाप का हुलिया बताते हुए उसके बिकने की सूचना होती है। इश्तिहार छपने के बाद कुछ लोग उसे खरीदने पहुँचते हैं मगर जैसे-जैसे उन्हें उसकी ख़ामियों के बारे में पता चलता है वे ख़रीदने से इंकार करते जाते हैं। फिर एक दिन अचानक एक बहुत बड़ा कारोबारी उसे ख़रीद लेता है और उसे अपने घर ले आता है। जब उसे पता चलता है कि ख़रीदा हुआ बाप एक ज़माने में बहुत बड़ा गायक था और एक लड़की के साथ उसकी दोस्ती भी थी तो कहानी एक दूसरा रुख़ इख़्तियार कर लेती है।
रहमान के जूते
जूते के ऊपर जूते चढ़ जाने को किसी सफ़र से जोड़ कर अँधविश्वास को बयान करती एक मर्मस्पर्शी कहानी। खाना खाते वक्त रहमान का जूता दूसरे जूते पर चढ़ा तो उसकी बीवी ने कहा कि उसे अपनी बेटी जीना से मिलने जाना है। जीना से मिलने जाने के लिए उसकी माँ ने बहुत सारी तैयारियाँ कर रखी थीं। फिर वह अपनी बेटी से मिलने के लिए सफ़र पर निकल पड़ा और सफ़र में उसके सामान की गठरी कहीं गुम हो जाती है जिसके लिए वह एक कांस्टेबल से उलझ जाता है। ज़ख़्मी हालत में उसे अस्पताल में भर्ती कराया जाता है। वहाँ भी उसका जूता दूसरे पर चढ़ा हुआ है जो इस बात का इशारा था कि वह अब एक लंबे सफ़र पर जाने वाला है।
कोख जली
यह एक ऐसी माँ की कहानी है जो फोड़े के ज़ख्मों ज़ख़्मों से परेशान बेटे से बे-पनाह मोहब्बत करती है। हालांकि बेटे के नासूर बन चुके ज़ख़्मों की वजह से सारी बस्ती उन से नफ़रत करती है। शुरू के दिनों में उसका बेटा शराब के नशे में उससे कहता है कि बहुत से लोग नशे में अपनी माँ को बीवी समझने लगते हैं मगर वह हमेशा ही उसकी माँ ही रही। हालांकि शराब पीकर आने के बाद वह बेटे के साथ भी वैसा ही बर्ताव करती है जैसा कि शौहर के पीकर आने के बाद उसके साथ किया करती थी।
ग्रहण
यह एक ऐसी गर्भवती स्त्री की कहानी है जिसके गर्भ के दौरान चाँद ग्रहण लगता है। वह एक अच्छे ख़ानदान की लड़की थी। मगर कायस्थों में शादी होने के बाद लड़की को मात्र बच्चा जनने की मशीन समझ लिया जाता है। गर्भवती होने और उस पर भी ग्रहण के औक़ात में भी घरेलू ज़िम्मेदारियाँ निभानी पड़ती हैं। ऐसे में उसे अपने मायके की याद आती है कि वहाँ ग्रहण के औक़ात में कैसे दान किया जाता था और गर्भवती के लिए बहुत सरे कामों को करने की मनाही थी, यह सब सोचते हुए अचानक वह सब कुछ छोड़कर भाग जाने का फैसला करती है।
दस मिनट बारिश में
यह बारिश में भीगती एक ऐसी ग़रीब औरत की कहानी है, जिसका शौहर उसे छोड़कर चला गया है और उसकी घोड़ी भी गुम हो गई है। उसका एक कम-अक़्ल बेटा है जो झोपड़ी में पड़ा रहता है। बारिश तेज़ होने की वजह से झोपड़ी की छत उड़ गई है जिसे वह औरत अकेले ही उसे ठीक कर रही है और दूर खड़े दो मर्द आपस में बात कर रहे हैं और इस इंतज़ार में हैं कि वह कब उन्हें अपनी मदद के लिए बुलाती है।
जोगिया
"मुहब्बत की इस कहानी की पूरी फ़िज़ा रंगों में डूबी हुई है। मुहब्बत आमेज़ इशारे और उपमाएं सब रंगों की मदद से अपनी मानवीयत वाज़ेह करते हैं। जुगल को अपनी महबूबा के रंग में रंगी हुई पूरी दुनिया नज़र आती है। वो जिस रंग के कपड़े पहनती है वही रंग उसे हर तरफ़ नज़र आता है, यहाँ तक कि जब वो जुदा होने लगती है तो उसकी सारी का रंग गुलाबी होता है लेकिन जुगल को उसका रंग जोगिया नज़र आता है।"
घर में बाज़ार में
कहानी समाज और घर में औरत के हालात को पेश करती है। शादी के बाद औरत शौहर से ख़र्चे के लिए पैसे मांगते हुए शर्माती है। मायके में तो ज़रूरत के पैसे बाप के कोट से ले लिया करती थी मगर ससुराल में शौहर के साथ ऐसा करता हुए वह खुद को बेस्वा सी महसूस करती है। वक़्त गु़जरने के साथ साथ शौहर उसे अपनी पसंद की चीज़ें लाकर देता है तो उसे एहसास होता है कि सचमुच वह बेस्वा ही है। एक रोज़ उसका शौहर उसे एक बाज़ारू औरत के बारे में बताता है तो वह कहती है कि घर भी तो एक बाज़ार ही है। फ़र्क़ सिर्फ़ इतना है कि वहाँ शोर ज़्यादा है और यहाँ कम।
पान शॉप
कहानी में अपनी महबूब चीज़ों को गिरवी रख कर पैसे उधार लेने वालों के शोषण को बयान किया गया है। बेगम बाज़ार में फ़ोटो स्टूडियो, जापानी गिफ्ट शॉप और पान शॉप पास-पास ही हैं। पहली दो दुकानों पर नाम के अनुसार ही काम होता और तीसरी दुकान पर पान बेचने के साथ ही क़ीमती चीज़ों को गिरवी रख कर पैसे भी उधार दिए जाते हैं। इस काम के लिए फ़ोटो स्टूडियो का मालिक और जापानी गिफ्ट शॉप वाला पान वाले की हमेशा बुराई करते हैं। जब एक रोज़ उन्हें पैसों की ज़रूरत होती है तो वे दोनों भी एक-दूसरे से छुपकर पान वाले के यहाँ अपनी क़ीमती चीज़ें गिरवी रखते हैं।
बब्बल
काम इच्छा में तड़पते हुए मर्द की कहानी है। दरबारी लाल सीता से मुहब्बत करता है लेकिन उससे शादी नहीं करना चाहता। दरबारी लाल आर्थिक रूप से सुदृढ़ है जबकि सीता एक ग़रीब विधवा की इकलौती बेटी है। सीता चाहती है कि दरबारी उससे शादी करने के बाद ही उससे यौन सम्बंध बनाये लेकिन दरबारी केवल अपनी हवस पूरी करना चाहता है। वह एक होटल में सीता के साथ जाता है जहाँ उन्हें संदेहास्पद समझ कर कमरा नहीं दिया जाता है। दूसरी बार वह एक भिखारन की सुंदर लड़के को साथ लेकर जाता है तो उसे कमरा मिल जाता है। दरबारी कामेच्छा में जल रहा है लेकिन बबल अपनी मासूमाना अदाओं से उसके इरादों में बाधित होता है। झुँझला कर वो बबल को थप्पड़ मार देता है। सीता की मामता जाग जाती है और वो बबल को अपनी आग़ोश में छुपा लेती है और दरबारी को शर्म दिलाती है। दरबारी लज्जित होता है और फिर सीता से शादी करने का वादा करता है।
छोकरी की लूट
कहानी में शादी जैसी पारंपरिक संस्कार को एक दूसरे ही रूप में पेश किया गया है। बेटियों के जवान होने पर माँएं अपनी छोकरियों की लूट मचाती हैं, जिससे उनका रिश्ता पक्का हो जाता है। प्रसादी की बहन की जब लूट मची तो उसे बड़ा गु़स्सा आया, क्योंकि रतना खू़ब रोई थी। बाद में उसने देखा कि रतना अपने काले-कलूटे पति के साथ खु़श है तो उसे एहसास होता है कि रतना की शादी ज़बरदस्ती नहीं हुई थी बल्कि वह तो खु़द से अपना लूट मचवाना चाहती थी।
आलू
पेट की आग किस तरह इंसान को अपना दृष्टिकोण बदलने पर मजबूर करती है और भले-बुरे में तमीज़ करने में असमर्थ हो जाता है, इस कहानी का मुख्य बिंदु है। लखी सिंह एक बहुत ही ग़रीब कामरेड था जो बैलगाड़ियों और छकड़ों में अटके रह गए आलू जमा करके घर ले जाता था। एक दिन कमेटी की तरफ़ से बैलगाड़ियों के लिए न्यू मेटक टायरों का बिल पास हो गया, जिसके विरोध में गाड़ी बानों ने हड़ताल की और हड़ताल के नतीजे में लखी सिंह उस दिन बिना आलूओं के घर पहुँचा। उसकी पत्नी बसंतो ने हर मौक़े पर एक कामरेड की तरह लखी सिंह का साथ दिया था, आज बिफर गई, और उसने लखी सिंह से पूछा कि उसने हड़ताल का विरोध क्यों न किया? लखी सिंह सोचने लगा क्या बसंतो भी प्रतिक्रियावादी हो गई है?
जब मैं छोटा था
बच्चों की नफ़्सियात पर मब्नी कहानी है। बच्चों के सामने बड़े जब अख़लाक़-ओ-आदत संवारने के लिए अपने बचपन की वाक़िआत को सुनाते हैं तो उन वाक़िआत में उनकी छवि एक नेक और शरीफ़ बच्चे की होती है। असल में ऐसा होता नहीं है, लेकिन जान बूझ कर ये झूठ बच्चों की नफ़्सियात पर बुरा असर डालती है। इस कहानी में एक बाप अपने बेटे को बचपन में की गई चोरी की वाक़िआ सुनाता है और बताता है कि उसने दादी के सामने क़बूल कर लिया था और दादी ने माफ़ कर दिया था। लेकिन बच्चा एक दिन जब पैसे उठा कर कुछ सामान ख़रीद लेता है और अपनी माँ के सामने चोरी को क़बूल नहीं करता तो माँ इतनी पिटाई करती है कि बच्चा बीमार पड़ जाता है। बच्चा अपने बाप से चोरी के वाक़िआ को सुनाने की फ़र्माइश करता है। बाप उसकी नफ़्सियात समझ लेता है और कहता है बेटा उठो और खेलो, मैंने जो चोरी की थी उसे आज तक तुम्हारी दादी के सामने क़बूल नहीं किया।
गुलामी
यह एक रिटायर्ड आदमी की ज़िंदगी की कहानी है। पोलहू राम सहायक पोस्ट मास्टर के पद से रिटायर हो कर घर आता है तो पहले पहल तो उसकी ख़ूब आव भगत होती है, लेकिन रफ़्ता-रफ़्ता उसके भजन, घर के कामों में दख़ल-अंदाज़ी की वजह से लड़के, बहू और पत्नी तक उससे ऊब जाते हैं। एक दिन जब वो पेंशन लेने जाता है तो उसे नोटिस बोर्ड से पता चलता है कि डाकख़ाने को एक्स्ट्रा डिपार्टमेंटल डाकख़ाने की ज़रूरत है जिसकी तनख़्वाह पच्चीस रुपये है। पोलहू राम यह नौकरी कर लेता है लेकिन काम के दौरान जब उस पर दमा का दौरा पड़ता है तो लोग दया करते हुए कहते हैं, डाकख़ाना क्यों नहीं इस ग़रीब बूढ़े को पेंशन दे देता?
तुलादान
धोबी के घर कहीं गोरा चट्टा छोकरा पैदा हो जाए तो उस का नाम बाबू रख देते हैं। साधू राम के घर बाबू ने जन्म लिया और ये सिर्फ़ बाबू की शक्ल-ओ-सूरत पर ही मौक़ूफ़ नहीं था, जब वो बड़ा हुआ तो उस की तमाम आदतें बाबुओं जैसी थीं। माँ को हिक़ारत से “ए यू” और बाप को
चेचक के दाग़
"जय राम बी.ए पास रेलवे में इकसठ रुपये का मुलाज़िम है। जय राम के चेहरे पर चेचक के दाग़ हैं, उसकी शादी सुखिया से हुई है जो बहुत ख़ूबसूरत है। सुखिया को पहले पहल तो जय राम से नफ़रत होती है लेकिन फिर उसकी शराफ़त, तालीम और नौकरी-पेशा होने के ख़याल से उसके चेचक के दाग़ को एक दम फ़रामोश कर देती है और शिद्दत से उसके आने का इंतज़ार करती रहती है। जय राम कई बार उसके पास से आकर गुज़र जाता है, सुखिया सोचती है कि शायद वो अपने चेचक के दाग़ों से शर्मिंदा है और शर्मीलेपन की वजह से नहीं आ रहा है। रात में सुखिया को उसकी ननद बताती है कि जय राम ने सुखिया की नाक लंबी होने पर एतराज़ किया है और उसके पास आने से इनकार कर दिया है।"
दूसरा किनारा
तीन मज़दूर-पेशा भाईयों के जद्द-ओ-जहद की कहानी है, जिसमें बाप अपने बेटों की नफ़्सियात को समझ नहीं पाता है। सुंदर, सोहना और रुजू अपने बाप के साथ बेकरी में काम करते थे। उनका गाँव खाड़ी के एक किनारे पर था और दूसरा किनारा उनको बहुत ख़ुशनुमा और दिलफ़रेब मालूम होता था। जब सुंदर के बचपन का दोस्त इल्म-उद-दीन तहसीलदार बन कर आया तो सुंदर ने भी तहसीलदार बनने की ठानी और दूसरे किनारे चला गया। सोहना ने भी दूसरे किनारे जाने की कोशिश की लेकिन बाप ने मार पीट कर उसे रोक लिया और एक दिन उसने ख़ुदकुशी कर ली, फिर बाप भी मर गया। एक दिन सुंदर झुर्रियों भरा चेहरा लेकर वापस आया तो वो ख़ून थूक रहा था। रुजू को उसने नसीहत की कि वो दूसरे किनारे की कभी ख़्वाहिश न करे।
मंगल अष्टिका
यह एक ब्रह्मचारी पंड़ित की कहानी है, जिसे अपने ब्रह्मचर्य पर नाज़ है साथ ही उसका जीवन साथी के न होने का दुख भी है। अपने एक यजमान की शादी की रस्म अदा कराते हुए उसे अपनी तन्हाई का एहसास होता है और उसकी तबीयत भी ख़राब हो जाती है। अपनी देखभाल के लिए अपनी भाभी को ख़त लिखता है मगर भाभी धान की कटाई में मसरूफ़ होने के बाइस उसकी देखभाल के लिए नहीं आ पाती। पंडित का एक रिश्तेदार पंड़ित से अपनी पत्नी की तारीफ़ करता है और पत्नी के होने के फ़ायदे बताता है। साथ ही वह पंड़ित को भी शादी करने की सलाह देता है, जिसे पंडित क़ुबूल कर लेता है।
हड्डियाँ और फूल
"हासिल की उपेक्षा और ला-हासिल के लिए गिले-शिकवे की इंसानी प्रवृति को इस कहानी में उजागर किया गया है। इस कहानी में मियाँ-बीवी के बीच शक-ओ-संदेह के नतीजे में पैदा होने वाली तल्ख़ी को बयान किया गया है। मुलम एक चिड़चिड़ा मोची है, गौरी उसकी ख़ूबसूरत बीवी है, मुलम के ज़ुल्म-ओ-ज़्यादती से आजिज़ आकर गौरी अपने मायके चली जाती है तो मुलम को अपनी ज़्यादतियों का एहसास होता है और वो बदहवासी की हालत में अजीब-अजीब हरकतें करता है, लेकिन जब वही गौरी वापस आती है तो स्टेशन पर भीड़ की वजह से एक अजनबी से टकरा जाती है और मुलम ग़ुस्से से हकलाते हुए कहता है, ये नए ढंग सीख आई हो... फिर आ गईं मेरी जान को दुख देने।"
मन की मन में
औरत के हसद और डाह के जज़्बे पर मब्नी कहानी है। माधव बहुत ही शरीफ़ इंसान था जो दूसरों की मदद के लिए हमेशा तैयार रहता था। वो एक बेवा अम्बो को बहन मान कर उसकी मदद करता था, जिसे उसकी बीवी कलकारनी नापसंद करती थी और उसे सौत समझती थी। ठीक मकर संक्रांत के दिन माधव कलकारनी से बीस रुपये लेकर जाता है कि उससे पाज़ेब बनवा लाएगा लेकिन उन रुपयों से वो अम्बो का क़र्ज़ लाला को अदा कर देता है। इस जुर्म के नतीजे में कलकारनी रात में माधव पर घर के दरवाज़े बंद कर लेती है और माधव निमोनिया से मर जाता है। मरते वक़्त वो कलकारनी को वसीयत करता है कि वो अम्बो का ख़्याल रखे लेकिन अगले बरस संक्रांत के दिन जब अम्बो उसके यहाँ आती है तो वो सौत और मनहूस समझ कर उसे घर से भगा देती है और फिर अम्बो ग़ायब ही जाती है।
हयातीन-बे
ग़रीबी पर मब्नी कहानी है। विटामिन बी की कमी की वजह से मातादीन मज़दूर की बीवी मनभरी के पुट्ठों में वर्म आ जाता है। मेस का एक मुलाज़िम अच्छी ख़ुराक और खाने का वादा करके मातादीन और मनभरी को अपने यहाँ मुलाज़िम रखवा लेता है और मनभरी का यौन शोषण करता है। जब मातादीन को इसकी ख़बर होती है तो वो वहाँ की नौकरी छोड़ देता है और एक दिन डाक्टर के यहाँ से विटामिन बी चोरी करने की वजह से हवालात में क़ैद हो जाता है। वो ख़ुश था कि मनभरी अब एक स्वस्थ बच्चे को जन्म देगी लेकिन उसे पता नहीं था कि अत्यधिक दुखी होने के कारण मनभरी का गर्भपात हो गया है।
बुक्की
कलकत्ता के एक सिनेमा काउंटर पर टिकट बेचती एक ऐसी लड़की की कहानी, जो एक्स्ट्रा चवन्नी ले कर नौजवानों और कुंवारों को लड़कियों के बग़ल वाली सीट देती है। उस रोज़ उसने आख़िरी टिकट एक काले और गंवार से दिखते लड़के को दिया था। शो के बाद जब उसने उससे बात की तो पता चला कि वह किसी गाँव से कलकत्ता देखने आया है। बातचीत के दौरान लड़की को एहसास होता है कि वह सचमुच कुछ भी नहीं जानता। वह उसे बताती है कि कलकत्ता एक औरत की तरह है और उसे समझाने के लिए वह उसे अपने साथ ले जाती है।
कशमकश
"नैतिक मूल्यों के पतन का मातम है। बूढ्ढा मोहना दो हफ़्तों से बीमार है, अक्सर ऐसा लगता है कि वो मर जाएगा लेकिन फिर जी उठता है। उसके तीनों बेटे चाहते हैं कि वो जल्द से जल्द मर जाये। दो हफ़्ते बाद जब वो मर जाता है तो उसका जुलूस निकाला जाता है और उसके जुलूस से मीठे चने उठा कर एक औरत अपने बेटे को देती है और कहती है कि खा ले तेरी भी उम्र इतनी लंबी हो जाएगी। औरत को देखकर ट्राम का ड्राइवर, चेकर और एक बाबू भी दौड़ कर उन से छोहारे आदि लेकर खाते हैं।"
अग़्वा
इसमें कहानी में युवावस्था के अल्लहड़पन और शोख़ी को बयान किया गया है। राय साहब शहर से बाहर एक कोठी बनवा रहे हैं जिसमें मज़दूर काम कर रहे हैं। कंसो राय साहब की चंचल लड़की है जो हर एक से उसकी नफ़्सियात समझ कर दिल लुभाने वाली बातें करती है। एक दिन मज़दूर कंसो के भाग जाने की क़ियास-आराई करते हैं लेकिन शेख़ जी यक़ीन और भरोसे के साथ खंडन करते हैं फिर कुछ ही दिन बाद वो भाग जाने की भविष्यवाणी करते हैं। और उसी दिन शाम को शेख़ जी रावी को दिखाते हैं कि कोठी के सामने अली जो खड़ा है, दरवाज़ा खुला हुआ है और कंसो अली जो की तरफ़ देखकर मुस्कुरा रही है।
एवलांश
"दहेज़ की लानत पर लिखी गई कहानी है। कहानी का रावी एक वाश लाइन इंस्पेक्टर है। आर्थिक परेशानी के कारण उसकी दो बेटियों के रिश्ते तय नहीं हो पा रहे हैं। रावी के कुन्बे में छः लोग हैं, जिनकी ज़िम्मेदारियों का बोझ उसके काँधे पर है। दहेज़ पूरा करने के लिए वो रिश्वतें भी लेता है लेकिन फिर भी लड़के वालों की फ़रमाइशें पूरी होने का कोई इम्कान नज़र नहीं आता। रावी दुख से मुक्ति पाने के लिए अख़बार में पनाह लेता है। एक दिन उसने पढ़ा कि एवालांश आ जाने की वजह से एक पार्टी दब कर रह गई। इसी बीच रिश्वत के इल्ज़ाम में रावी नौकरी से निकाल दिया जाता है। उसी दिन उसकी छोटी बेटी दौड़ती हुई आती है और बताती है एक रेस्क्यू पार्टी ने सब लोगों को बचा लिया। रावी अपनी बेटी से पूछता है, क्या कोई रेस्क्यू पार्टी आएगी... रुकू़... क्या वो हमेशा आती है?"
हम-दोश
"दुनिया की रंगीनी और बे-रौनक़ी के तज़्किरे के साथ इंसान की ख़्वाहिशात को बयान किया गया है। शिफ़ाख़ाने के मरीज़ शिफ़ाख़ाने के बाहर की दुनिया के लोगों को देखते हैं तो उनके दिल में शदीद क़िस्म की ख़्वाहिश अंगड़ाई लेती है कि वो कभी उनके बराबर हो सकेंगे या नहीं। कहानी का रावी एक टांग कट जाने के बावजूद शिफ़ायाब हो कर शिफ़ाख़ाने से बाहर आ जाता है और दूसरे लोगों के बराबर हो जाता है लेकिन उसका एक साथी मुग़ली, जिसे बराबर होने की शदीद तमन्ना थी और जो धीरे धीरे ठीक भी हो रहा था, मौत के मुँह में चला जाता है।"
रद्द-ए-अमल
ये एक नसीहत-आमेज़ कहानी है। जलाल एक ला-ओ-बाली और ऐश पसंद तबीयत का मालिक है। उसके चचा मरज़-उल-मौत में उसे नसीहत करते हैं कि बाहर एक अंधा जा रहा है। उसके रास्ते पर उतार-चढ़ाव दोनों हैं, मगर उसे तनिक चिंता नहीं, कि उसके पास लाठी है। चचा की मौत के बाद जलाल उस वाक़्ये के विभिन्न अर्थ निकालता है और फिर वो खू़न ख़राबे से तौबा कर लेता है।
मुआविन और मैं
"एक ख़ुद्दार सहायक और एक एहसास-ए-कमतरी के शिकार आक़ा की कहानी है। पितंबर को नवजात पत्रिका कहानी के संपादक ने अपने सहायक के रूप में रखा है। बहुत जल्द पितंबर अपनी ज़ेहानत और क़ाबिलियत से कहानी को मज़बूत कर देता है। संपादक हमेशा उससे डरा रहता है कि कहीं पितंबर उसको छोड़कर न चला जाये, इसीलिए वो कभी पितंबर की तारीफ़ नहीं करता बल्कि हमेशा कमी निकालता रहता है और कहता रहता है कि तुम ख़ुद अपना कोई काम क्यों नहीं कर लेते। एक दिन जबकि पितंबर दो दिन का भूखा था और उसकी बहन बहुत बीमार थी, संपादक ने उससे आटा और घी अपने घर पहुँचाने के लिए कहा लेकिन पितंबर ने निजी काम करने से मना कर दिया और दफ़्तर से चला गया। संपादक कोशिश के बावजूद उसे रोक न सका।"
मौत का राज़
इस बे-रब्त ओ ना-हमवार ज़मीन के शुमाल की तरफ़ नबाताती टीलों के दामन में, मैं ने गंदुम की बत्तीसवीं फ़सल लगाई थी और सरतानी सूरज की हयात कश-ए-तमाज़त में पकती हुई बालियों को देख कर मैं ख़ुश हो रहा था। गंदुम का एक एक दाना पहाड़ी दीमक के बराबर था। एक ख़ोशे को
ना-मुराद
सफ़दर एक मज़हबी घराने का रौशन ख़याल फ़र्द है, राबिया उसकी मंगेतर है जिसका अचानक इंतिक़ाल हो जाता है। राबिया की माँ सफ़दर को आख़िरी दीदार के लिए बुलवा भेजती है। सफ़दर रास्ते भर बुरे ख़यालात के नुक़्सानात के बारे में ग़ौर करता रहता है। उसे इस बात पर हैरत होती है कि रिश्ता तय करते वक़्त न उससे कोई मश्वरा किया गया न राबिया को होने वाला शौहर दिखाया गया तो फिर इस तकल्लुफ़ की क्या ज़रूरत। वो राबिया के घर पहुँचता है तो राबिया की माँ हाय वावेला करती है और बार-बार राबिया को नामुराद कहती रहती है। राबिया का चेहरा देखने के बाद सफ़दर फ़ैसला नहीं कर पाता है कि राबिया नामुराद है या सफ़दर या राबिया की माँ जो दोनों से वाक़िफ़ थी।
मुक़द्दस झूठ
कहानी एक बच्चे के जज़्बात और एहसास को पेश करती है। बच्चा अपने ही घर में चोरी करता है और जब उसकी माँ को पता चलता है तो वह उसकी पिटाई करती है जिसकी वजह से बच्चा बीमार हो जाता है। बीमारी की हालत में बच्चे को अपने बाप की सुनाई कहानी याद आती है कि जब बचपन में उन्होंने एक बार चोरी की थी तो पकड़े जाने पर अपनी ग़लती को कु़बूल कर लिया था। बच्चे को दुख है कि उसने अपनी चोरी कुबूल क्यों नहीं की। बाद में उसे पता चलता है कि अब्बा ने झूठ कहा था। उन्होंने अपनी चोरी कु़बूल नहीं की थी। इस बात से उसे सुकून का एहसास होता है।
मुक्ति बोध
एक ऐसे शख़्स की कहानी जो फ़िल्म इंडस्ट्री में प्ले-बैक सिंगर बनना चाहता है। इसके लिए वह हर मुमकिन कोशिश करता है, मगर कामयाब नहीं हो पाता। फिर एक डायरेक्टर से उसकी मुलाक़ात होती है, जिसकी हाल में बनी फ़िल्म ज़बरदस्त हिट हुई थी। डायरेक्टर को अपनी अगली फ़िल्म के लिए म्यूज़िक डायरेक्टर चाहिए। इसके लिए वह उसे मुक्तिबोध का नाम सुझाता। मुक्तिबोध किसी ज़माने में टॉप का म्यूज़िक डायरेक्ट रहा था, मगर इन दिनों उसके सितारे गर्दिश में थे और वह गर्दन तक क़र्ज़़ में डूबा हुआ था।
लक्षमण
एक कुंवारे आदमी के भावात्मक शोषण की कहानी है। लछमन काठ गोदाम गाँव का पचपन बरस का आदमी था, जिसे गाँव की औरतें और आदमी शादी का लालच देकर ख़ूब-ख़ूब काम लेते, उसकी बहादुरी के तज़्किरे करते और विभिन्न नामों की लड़कियों से उसके रिश्ते की बात जोड़ते। एक दिन वो गौरी की छत पर काम करते करते अचानक नीचे गिरा और मर गया। उसकी चिता को जब जलाया गया तो गाँव के सब लोग रो रहे थे।
लार्वे
अज़ीज़-उद-दीन एक ग़रीब नौकरी पेशा शख़्स है। अपने झोंपड़े के बाहर बने गड्ढे में लार्वों को देखकर उसके ज़ेहन में कई तरह के ख़यालात आते हैं। उन लार्वों को ज़िंदा रखने के लिए वो हर मुम्किन कोशिश करता है कि गड्ढे में गंदा पानी जमा रहे क्योंकि साफ़ पानी में लार्वे मर जाते हैं। उसकी बीवी अज़ीज़ा को मजिस्ट्रेट प्रीतम दास बतौर ख़ादिमा अपने साथ कश्मीर ले जाते हैं लेकिन वहाँ से तार आता है कि अज़ीज़ा को पहाड़ का सेहतमंद पानी रास न आया। वो डायरिया और पेचिश की शिकायत में मुब्तिला हो कर अचानक मर गई। अज़ीज़-उद-दीन के मुँह से बस इतना ही निकला, ऐ ख़ुदा तू अपनी बारिश को थाम ले।
मिथुन
"फ़ंकार की ना-क़द्री और उसके शोषण की कहानी है। कीर्ति एक आर्टिस्ट की बेटी है जिसके बनाए हुए चित्रों को मगनलाल कौड़ियों के मोल ख़रीदता है और उन्हें सैकड़ों हज़ारों रुपए में बेच देता है। कीर्ति की माँ अस्पताल में भर्ती होती है, उसे ऑप्रेशन के लिए पैसों की सख़्त ज़रूरत होती है लेकिन उस वक़्त भी मगनलाल अपने शोषणकारी रवय्ये से बाज़ नहीं आता और वो सैकड़ों रुपए की मूर्ती के केवल दस रुपए देता है। मगनलाल कीर्ति को कामुक मूर्तियाँ बनाने के लिए उकसाता है और कीर्ति उससे वादा करके चली जाती है। इस बीच कीर्ति की माँ मर जाती है। कीर्ति जब अगली बार मिथुन लेकर आती है तो उससे हज़ार रुपए की मांग करती है जिस पर तकरार होती है। मगन जब मिथुन को देखता है तो उसमें बनी हुई औरत के पर्दे में कीर्ति को देख लेता है जिस पर वो अपने शक का इज़हार करता है तो कीर्ति उसके मुँह पर थप्पड़ मार कर चली जाती है। मर्द का रवय्या एक कमज़ोर औरत को किस तरह ताक़तवर बना देता है, यही इस कहानी का ख़ुलासा है।"
लम्स
"यह वर्ग संघर्ष पर आधारित कहानी है। सर जीव राम के मूर्ति के लोकार्पण के मौक़े पर बहुत भीड़ है। सर जीव राम की मूर्ति के पत्थर पर लिखा है, सर जीव राम 1862 से 1931 तक... एक बड़ा सखी और आदम दोस्त। मूर्ति का लोकार्पण एक वयोवृद्ध नवाब साहब करते हैं जिनके बारे में भीड़ क़ियास लगाती है कि ये भी जल्द ही मूर्ति बन जाऐंगे। हुजूम को सर जीव राम के सखी होने में संदेह है और वे कई तरह की बातें करते हैं। लोकार्पण के बाद भी हुजूम वहीं खड़ा रहता है जिसे सेवा समिती के कार्यकर्ता हटाने की कोशिश करते हैं। वो उस बुत को छूने की कोशिश करते हैं और जब बुत के पाँव स्याह हो जाते हैं तो वो निश्चिंत हो कर अपने अपने काम पर चले जाते हैं।"
join rekhta family!
-
गतिविधियाँ76
बाल-साहित्य1985
-
