aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
1909 - 1988 | अलीगढ़, भारत
व्यंग युक्त भावनात्मक तीक्ष्णता के लिए प्रख्यात
याद-ए-माज़ी 'अज़ाब है या-रब
छीन ले मुझ से हाफ़िज़ा मेरा
हाँ कभी ख़्वाब-ए-इश्क़ देखा था
अब तक आँखों से ख़ूँ टपकता है
उस से पूछे कोई चाहत के मज़े
जिस ने चाहा और जो चाहा गया
Aabgeene
1945
Aabgine
Afadi Adab
1959
अख़्तर अनसारी : शख़्स और शायर
1990
Akhtar Ansari Aur Unki Ghazal-Goi
2006
Chand Nazmen
1967
Dahaan-e-Zakhm
1971
Dahan-e-Zakhm
Ek Adabi Dairy
एक क़दम और सही
1984
अब कहाँ हूँ कहाँ नहीं हूँ मैं जिस जगह हूँ वहाँ नहीं हूँ मैं कौन आवाज़ दे रहा है मुझे? कोई कह दो यहाँ नहीं हूँ मैं
समझता हूँ मैं सब कुछ सिर्फ़ समझाना नहीं आता तड़पता हूँ मगर औरों को तड़पाना नहीं आता
वो दिल नहीं रहा वो तबीअत नहीं रही वो शब को ख़ून रोने की आदत नहीं रही महसूस कर रहा हूँ मैं जीने की तल्ख़ियाँ शायद मुझे किसी से मोहब्बत नहीं रही
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