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अम्न लख़नवी

1898 - 1983 | लखनऊ, भारत

राष्ट्रीय एकता, धार्मिक एकता और जज़्बा-ए-आज़ादी को समर्पित शायरी के लिए मशहूर , स्वतंत्रता सेनानी

राष्ट्रीय एकता, धार्मिक एकता और जज़्बा-ए-आज़ादी को समर्पित शायरी के लिए मशहूर , स्वतंत्रता सेनानी

अम्न लख़नवी के शेर

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ज़िंदगी इक सवाल है जिस का जवाब मौत है

मौत भी इक सवाल है जिस का जवाब कुछ नहीं

ज़िंदगी इक सवाल है जिस का जवाब मौत है

मौत भी इक सवाल है जिस का जवाब कुछ नहीं

कहानी अपनी अपनी अहल-ए-महफ़िल जब सुनाते हैं

मुझे भी याद इक भूला हुआ अफ़्साना आता है

कहानी अपनी अपनी अहल-ए-महफ़िल जब सुनाते हैं

मुझे भी याद इक भूला हुआ अफ़्साना आता है

ज़मीं पर हैं वो कुछ मिट्टी के पुतले

कि जिन में रिफ़अतें हैं आसमाँ की

ज़मीं पर हैं वो कुछ मिट्टी के पुतले

कि जिन में रिफ़अतें हैं आसमाँ की

मुकम्मल दास्ताँ का इख़्तिसार इतना ही काफ़ी है

सुलाया शोर-ए-दुनिया ने जगाया शोर-ए-महशर ने

मुकम्मल दास्ताँ का इख़्तिसार इतना ही काफ़ी है

सुलाया शोर-ए-दुनिया ने जगाया शोर-ए-महशर ने

ज़बान दहन से जो खुलते नहीं हैं

वो खुल जाते हैं राज़ अक्सर नज़र से

ज़बान दहन से जो खुलते नहीं हैं

वो खुल जाते हैं राज़ अक्सर नज़र से

तुम्हारी बज़्म भी क्या बज़्म है आदाब हैं कैसे

वही मक़्बूल होता है जो गुस्ताख़ाना आता है

तुम्हारी बज़्म भी क्या बज़्म है आदाब हैं कैसे

वही मक़्बूल होता है जो गुस्ताख़ाना आता है

ज़माने की कशाकश का दिया पैहम पता मुझ को

कहीं टूटे हुए दिल ने कहीं टूटे हुए सर ने

ज़माने की कशाकश का दिया पैहम पता मुझ को

कहीं टूटे हुए दिल ने कहीं टूटे हुए सर ने

या तो अंदाज़ ही दुनिया का बदल दे या-रब

या वो दिल दे के ये अंदाज़ गवारा हो जाए

या तो अंदाज़ ही दुनिया का बदल दे या-रब

या वो दिल दे के ये अंदाज़ गवारा हो जाए

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