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बाक़ी सिद्दीक़ी

1905 - 1972 | रावलपिंडी, पाकिस्तान

पाकिस्तान के प्रमुखतम आधुनिक शायरों में शामिल

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बाक़ी सिद्दीक़ी

ग़ज़ल 32

अशआर 37

तुम ज़माने की राह से आए

वर्ना सीधा था रास्ता दिल का

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दोस्त हर ऐब छुपा लेते हैं

कोई दुश्मन भी तिरा है कि नहीं

'बाक़ी' जो चुप रहोगे तो उट्ठेंगी उँगलियाँ

है बोलना भी रस्म-ए-जहाँ बोलते रहो

इस बदलते हुए ज़माने में

तेरे क़िस्से भी कुछ पुराने लगे

हर नए हादसे पे हैरानी

पहले होती थी अब नहीं होती

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Recitation

aah ko chahiye ek umr asar hote tak SHAMSUR RAHMAN FARUQI

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