aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
1944 | कोटा, भारत
शहर के अंधेरे को इक चराग़ काफ़ी है
सौ चराग़ जलते हैं इक चराग़ जलने से
मिरे अज़ीज़ ही मुझ को समझ न पाए कभी
मैं अपना हाल किसी अजनबी से क्या कहता
सोच उन की कैसी है कैसे हैं ये दीवाने
इक मकाँ की ख़ातिर जो सौ मकाँ जलाते हैं
Andaz-e-Nazar
2010
Neela Aakash
Rakh
शहर के अंधेरे को इक चराग़ काफ़ी है सौ चराग़ जलते हैं इक चराग़ जलने से
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