इकराम आरफ़ी
ग़ज़ल 13
अशआर 6
चारा-गरान-ए-ज़ख़्म को फिर भी मिरा सलाम
हालाँकि इंदिमाल किसी ने नहीं किया
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सब लोग मुंतज़िर हैं कि दरवाज़ा कुछ कहे
दीवार से सवाल किसी ने नहीं किया
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ऐसा नहीं कि फूल दरख़्तों ही से गिरे
कुछ शाख़-ए-चश्म से भी झड़े हैं जनाब-ए-मन
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दिल में आए कोई खरी 'औरत
ये कुआँ भर गया है खोटियों से
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वा'दों के जिस मक़ाम पे छोड़ा था आप ने
हम आज तक वहीं पे खड़े हैं जनाब-ए-मन
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