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इक़बाल अशहर कुरैशी

1950 - 1993 | नागपुर, भारत

इक़बाल अशहर कुरैशी

ग़ज़ल 18

अशआर 5

सताया आज मुनासिब जगह पे बारिश ने

इसी बहाने ठहर जाएँ उस का घर है यहाँ

'अशहर' बहुत सी पत्तियाँ शाख़ों से छिन गईं

तफ़्सीर क्या करें कि हवा तेज़ अब भी है

दरख़्त हाथ हिलाते थे रहनुमाई को

मुसाफिरों ने तो कुछ भी नहीं कहा मुझ से

ख़ुद को जब भूल से जाते हैं तो यूँ लगता है

ज़िंदगी तेरे अज़ाबों से निकल आए हैं

जो लोग लौट के ख़ुद मेरे पास आए हैं

वो पूछते हैं कि 'अशहर' यहीं पे अब तक हो

"नागपुर" के और शायर

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aah ko chahiye ek umr asar hote tak SHAMSUR RAHMAN FARUQI

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