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पल्लव मिश्रा

1998 | दिल्ली, भारत

पल्लव मिश्रा

ग़ज़ल 11

अशआर 13

मैं तुझ से मिलने समय से पहले पहुँच गया था

सो तेरे घर के क़रीब कर भटक रहा हूँ

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ये जिस्म तंग है सीने में भी लहू कम है

दिल अब वो फूल है जिस में कि रंग-ओ-बू कम है

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ये तय हुआ था कि ख़ूब रोएँगे जब मिलेंगे

अब उस के शाने पे सर है तो हँसते जा रहे हैं

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शहर-ए-जाँ में वबाओं का इक दौर था

मैं अदा-ए-तनफ़्फ़ुस में कमज़ोर था

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वो नशा है के ज़बाँ अक़्ल से करती है फ़रेब

तू मिरी बात के मफ़्हूम पे जाता है कहाँ

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चित्र शायरी 1

 

वीडियो 5

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वीडियो का सेक्शन
शायर अपना कलाम पढ़ते हुए

पल्लव मिश्रा

कुछ ऐसे दो-जहाँ से राब्ता रक्खा गया है

पल्लव मिश्रा

तुम्हारी दुनिया के बाहर अंदर भटक रहा हूँ

पल्लव मिश्रा

लहू में घुल घुल के बह रहे थे रगों के अंदर

पल्लव मिश्रा

वो बार-ए-फ़र्ज़-ए-तकल्लुफ मुझी को धोना पड़ा

पल्लव मिश्रा

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aah ko chahiye ek umr asar hote tak SHAMSUR RAHMAN FARUQI

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