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aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair

jis ke hote hue hote the zamāne mere

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रईस अमरोहवी

1914 - 1988 | कराची, पाकिस्तान

प्रख्यात उर्दू शायर, पत्रकार और क़तआ-निगार, हुकूमत-ए-पाकिस्तान द्वारा तमग़ा-ए-हुस्न-ए-कारकर्दगी से सम्मानित

प्रख्यात उर्दू शायर, पत्रकार और क़तआ-निगार, हुकूमत-ए-पाकिस्तान द्वारा तमग़ा-ए-हुस्न-ए-कारकर्दगी से सम्मानित

रईस अमरोहवी के शेर

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ख़ामोश ज़िंदगी जो बसर कर रहे हैं हम

गहरे समुंदरों में सफ़र कर रहे हैं हम

किस ने देखे हैं तिरी रूह के रिसते हुए ज़ख़्म

कौन उतरा है तिरे क़ल्ब की गहराई में

हम अपनी ज़िंदगी तो बसर कर चुके 'रईस'

ये किस की ज़ीस्त है जो बसर कर रहे हैं हम

सिर्फ़ तारीख़ की रफ़्तार बदल जाएगी

नई तारीख़ के वारिस यही इंसाँ होंगे

पहले ये शुक्र कि हम हद्द-ए-अदब से न बढ़े

अब ये शिकवा कि शराफ़त ने कहीं का न रखा

आदमी की तलाश में है ख़ुदा

आदमी को ख़ुदा नहीं मिलता

अपने को तलाश कर रहा हूँ

अपनी ही तलब से डर रहा हूँ

अभी से शिकवा-ए-पस्त-ओ-बुलंद हम-सफ़रो

अभी तो राह बहुत साफ़ है अभी क्या है

टहनी पे ख़मोश इक परिंदा

माज़ी के उलट रहा है दफ़्तर

पहले भी ख़राब थी ये दुनिया

अब और ख़राब हो गई है

अब दिल की ये शक्ल हो गई है

जैसे कोई चीज़ खो गई है

दिल कई रोज़ से धड़कता है

है किसी हादसे की तय्यारी

सदियों तक एहतिमाम-ए-शब-ए-हिज्र में रहे

सदियों से इंतिज़ार-ए-सहर कर रहे हैं हम

हम अपने हाल-ए-परेशाँ पे बारहा रोए

और उस के ब'अद हँसी हम को बारहा आई

ये कर्बला है नज़्र-ए-बला हम हुए कि तुम

नामूस-ए-क़ाफ़िला पे फ़िदा हम हुए कि तुम

चंद बेनाम-ओ-निशाँ क़ब्रों का

मैं अज़ा-दार हूँ या है मिरा दिल

दिल से मत सरसरी गुज़र कि 'रईस'

ये ज़मीं आसमाँ से आती है

आज का ज़ौक़ ओ शौक़ का मज़मून

साग आलू प्याज़ की बातें

कुछ हक़ीक़ी अफ़ीम-ची देखे

कुछ सियासी अफ़ीम-ची निकले

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