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रईस अमरोहवी

1914 - 1988 | कराची, पाकिस्तान

रईस अमरोहवी

ग़ज़ल 42

नज़्म 4

 

अशआर 17

ख़ामोश ज़िंदगी जो बसर कर रहे हैं हम

गहरे समुंदरों में सफ़र कर रहे हैं हम

सिर्फ़ तारीख़ की रफ़्तार बदल जाएगी

नई तारीख़ के वारिस यही इंसाँ होंगे

हम अपनी ज़िंदगी तो बसर कर चुके 'रईस'

ये किस की ज़ीस्त है जो बसर कर रहे हैं हम

आदमी की तलाश में है ख़ुदा

आदमी को ख़ुदा नहीं मिलता

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पहले ये शुक्र कि हम हद्द-ए-अदब से बढ़े

अब ये शिकवा कि शराफ़त ने कहीं का रखा

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हास्य 2

 

क़ितआ 4

 

पुस्तकें 30

वीडियो 11

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शायर अपना कलाम पढ़ते हुए

रईस अमरोहवी

रईस अमरोहवी

रईस अमरोहवी

रईस अमरोहवी

Reciting own poetry at a mushaira

रईस अमरोहवी

ग़ुरूब-ए-मेहर का मातम है गुलिस्तानों में

रईस अमरोहवी

रईस अमरोहवी

अपने को तलाश कर रहा हूँ

रईस अमरोहवी

ख़ामोश ज़िंदगी जो बसर कर रहे हैं हम

रईस अमरोहवी

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Recitation

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