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aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair

jis ke hote hue hote the zamāne mere

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साबिर ज़फ़र

ग़ज़ल 49

अशआर 49

मैं ऐसे जमघटे में खो गया हूँ

जहाँ मेरे सिवा कोई नहीं है

शाम से पहले तिरी शाम होने दूँगा

ज़िंदगी मैं तुझे नाकाम होने दूँगा

मैं सोचता हूँ मुझे इंतिज़ार किस का है

किवाड़ रात को घर का अगर खुला रह जाए

उम्र भर लिखते रहे फिर भी वरक़ सादा रहा

जाने क्या लफ़्ज़ थे जो हम से तहरीर हुए

ख़िज़ाँ की रुत है जनम-दिन है और धुआँ और फूल

हवा बिखेर गई मोम-बत्तियाँ और फूल

पुस्तकें 3

 

वीडियो 3

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शायर अपना कलाम पढ़ते हुए

साबिर ज़फ़र

साबिर ज़फ़र

Tum apne gird hisaaro ka silsila rakhna

साबिर ज़फ़र

तुम अपने गिर्द हिसारों का सिलसिला रखना

साबिर ज़फ़र

दरीचा बे-सदा कोई नहीं है

साबिर ज़फ़र

दरीचा बे-सदा कोई नहीं है

साबिर ज़फ़र

ऑडियो 8

कोई तो तर्क-ए-मरासिम पे वास्ता रह जाए

ख़ुमार-ए-शब में जो इक दूसरे पे गिरते हैं

दरीचा बे-सदा कोई नहीं है

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