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सऊद उस्मानी के शेर

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हैरत से तकता है सहरा बारिश के नज़राने को

कितनी दूर से आई है ये रेत से हाथ मिलाने को

पक्का रस्ता कच्ची सड़क और फिर पगडंडी

जैसे कोई चलते चलते थक जाता है

जान है तो जहान है दिल है तो आरज़ू भी है

इशक़ भी हो रहेगा फिर जान अभी बचाइए

ये जो मैं इतनी सहूलत से तुझे चाहता हूँ

दोस्त इक उम्र में मिलती है ये आसानी भी

मुझे ये सारे मसीहा अज़ीज़ हैं लेकिन

ये कह रहे हैं कि मैं तुम से फ़ासला रक्खूँ

मैं चाहता हूँ उसे और चाहने के सिवा

मिरे लिए तो कोई और रास्ता भी नहीं

सूरज के उफ़ुक़ होते हैं मंज़िल नहीं होती

सो ढलता रहा जलता रहा चलता रहा मैं

तेरी शिकस्त अस्ल में मेरी शिकस्त है

तू मुझ से एक बार भी हारा तो मैं गया

ख़्वाहिश है कि ख़ुद को भी कभी दूर से देखूँ

मंज़र का नज़ारा करूँ मंज़र से निकल कर

हर एक जिस्म में मौजूद हश्त-पा की तरह

वबा का ख़ौफ़ है ख़ुद भी किसी वबा की तरह

तमाम उम्र यहाँ किस का इंतिज़ार हुआ है

तमाम उम्र मिरा कौन इंतिज़ार करेगा

इतनी सियाह-रात में इतनी सी रौशनी

ये चाँद वो नहीं मिरा महताब और है

बहुत दिनों में मिरे घर की ख़ामुशी टूटी

ख़ुद अपने-आप से इक दिन कलाम मैं ने किया

उन से भी मेरी दोस्ती उन से भी रंजिशें

सीने में एक हल्क़ा-ए-अहबाब और है

ये मेरी काग़ज़ी कश्ती है और ये मैं हूँ

ख़बर नहीं कि समुंदर का फ़ैसला क्या है

समझ लिया था तुझे दोस्त हम ने धोके में

सो आज से तुझे बार-ए-दिगर समझते हैं

ये तो दुनिया भी नहीं है कि किनारा कर ले

तू कहाँ जाएगा दिल के सताए हुए शख़्स

किसी अलाव का शोला भड़क के बोलता है

सफ़र कठिन है मगर एक बार आख़िरी बार

वो चाहता था कि देखे मुझे बिखरते हुए

सो उस का जश्न ब-सद-एहतिमाम मैं ने किया

हर इक उफ़ुक़ पे मुसलसल तुलूअ होता हुआ

मैं आफ़्ताब के मानिंद रहगुज़ार में था

हर शय से पलट रही हैं नज़रें

मंज़र कोई जम नहीं रहा है

नज़र तो अपने मनाज़िर के रम्ज़ जानती है

कि आँख कह नहीं सकती सुनी-सुनाई हुई

आख़िर इक रोज़ उतरनी है लिबादों की तरह

तन-ए-मल्बूस! ये पहनी हुई उर्यानी भी

कुछ और भी दरकार था सब कुछ के अलावा

क्या होगा जिसे ढूँडता था तेरे सिवा मैं

मिज़ाज-ए-दर्द को सब लफ़्ज़ भी क़ुबूल थे

किसी किसी को तिरे ग़म का इस्तिआरा किया

ऐसा है कि सिक्कों की तरह मुल्क-ए-सुख़न में

जारी कोई इक याद पुरानी करें हम भी

यकजाई से पल भर की ख़ुद-आराई भली थी

शोले से निकल आए शरारे की तरह हम

बरून-ए-ख़ाक फ़क़त चंद ठेकरे हैं मगर

यहाँ से शहर मिलेंगे अगर खुदाई हुई

काग़ज़ की ये महक ये नशा रूठने को है

ये आख़िरी सदी है किताबों से 'इश्क़ की

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