Shabnam Rumani's Photo'

शबनम रूमानी

1928 - 2009 | पाकिस्तान

शबनम रूमानी

ग़ज़ल 17

नज़्म 6

अशआर 4

ज़िंदगी ख़्वाब देखती है मगर

ज़िंदगी ज़िंदगी है ख़्वाब नहीं

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तेरी ताबिश से रौशन हैं गुल भी और वीराने भी

क्या तू भी इस हँसती-गाती दुनिया का मज़दूर है चाँद?

अपनी मजबूरी को हम दीवार-ओ-दर कहने लगे

क़ैद का सामाँ किया और उस को घर कहने लगे

मुझे ये ज़ोम कि मैं हुस्न का मुसव्विर हूँ

उन्हें ये नाज़ कि तस्वीर तो हमारी है

पुस्तकें 13

वीडियो 8

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शायर अपना कलाम पढ़ते हुए

शबनम रूमानी

शबनम रूमानी

शबनम रूमानी

Shabnam Rumani at a mushaira

शबनम रूमानी

आधा जीवन बीता आहें भरने में

शबनम रूमानी

तमाम उम्र की आवारगी पे भारी है

शबनम रूमानी

मैं ने किस शौक़ से इक उम्र ग़ज़ल-ख़्वानी की

शबनम रूमानी

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