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aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair

jis ke hote hue hote the zamāne mere

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ताहिर अदीम

1973 | जर्मनी

ताहिर अदीम

ग़ज़ल 27

अशआर 8

फ़क़त तुम ही नहीं नाराज़ मुझ से जान-ए-जानाँ

मिरे अंदर का इंसाँ तक ख़फ़ा है इंतिहा है

मुझे वो छोड़ कर जब से गया है इंतिहा है

रग-ओ-पय में फ़ज़ा-ए-कर्बला है इंतिहा है

रंग क्या अजब दिया मेरी बेवफ़ाई को

उस ने यूँ किया कि मेरे ख़त जलाए ऊद में

उसे भी पर्दा-ए-तहज़ीब को गिराना है

मुझे भी पैकर-ए-नायाब से निकलना है

नहीं है रहना उसे भी बहार में 'ताहिर'

मुझे भी मौसम-ए-शादाब से निकलना है

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