तरकश प्रदीप
ग़ज़ल 11
अशआर 14
और भटकेंगे तो कुछ और नया देखेंगे
हम तो आवारा परिंदे हैं हमारा क्या है
-
शेयर कीजिए
- ग़ज़ल देखिए
मेरा पिंजरा खोल दिया है तुम भी अजीब शिकारी हो
अपने ही पर काट लिए हैं मैं भी अजीब परिंदा हूँ
-
शेयर कीजिए
- ग़ज़ल देखिए
पागल वहशी तन्हा तन्हा उजड़ा उजड़ा दिखता हूँ
कितने आईने बदले हैं मैं वैसे का वैसा हूँ
-
शेयर कीजिए
- ग़ज़ल देखिए
बनाता हूँ मैं तसव्वुर में उस का चेहरा मगर
हर एक बार नई काएनात बनती है
-
शेयर कीजिए
- ग़ज़ल देखिए