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aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair

jis ke hote hue hote the zamāne mere

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ज़र्वा रॉय

ग़ज़ल 8

अशआर 16

कुछ न कुछ दिल के पास है तेरा

तू नहीं तो तिरी कमी है अभी

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ये लम्हा-भर की अज़िय्यत का क्या गिला करना

पड़ी है 'उम्र अभी और दिल जलाने में

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किस क़दर दिल-फ़रेब लगता है

मुझ से वो हम-कलाम होता हुआ

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सजे जो शाख़-ए-तमन्ना में याद की ख़ुशबू

समेटने कभी बैठूँ तो यूँही मुस्काऊँ

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कुछ तलब थी उसे मु'आफ़ी की

और कुछ मैं भी दिल-कुशादा थी

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