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यह लेख इस सवाल का जवाब देता है कि क्या फ़ैज़ की सियासी शायरी वक़्त गुज़रने के साथ अपनी अहमियत खो देगी, और यह साफ़ करता है कि उनका सौंदर्यबोध (जमालियाती रचाव) उन्हें अमर बनाता है।
इस लेख में फ़िराक़ की शायरी पर अंग्रेज़ी रूमानियत और संस्कृत काव्य के असर और उनके यहाँ हुस्न-ओ-इश्क़ के आफ़ाक़ी (सार्वभौमिक) तसव्वुर का जायज़ा लिया गया है।
उर्दू ग़ज़ल पर फ़ारसी का गहरा असर होने के बावुजूद, यह हिंदुस्तानी तहज़ीब, मौसमों, रस्म-ओ-रिवाज और समाजी और सियासी करवटों की एक सच्ची और रंगारंग तस्वीर पेश करती है।
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