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मिर्ज़ा ग़ालिब की शख़्सियत में ज़िंदा-दिली और हाज़िर-जवाबी इस क़दर रची-बसी थी कि अल्ताफ़ हुसैन हाली ने उन्हें 'हैवान-ए-नातिक़' (बोलने वाले जीव) के बजाए 'हैवान-ए-ज़रीफ़' (मज़ाक़िया जीव) कहना ज़्यादा मुनासिब समझा।
मिर्ज़ा ग़ालिब के खाने-पीने की आदतें बहुत ख़ास थीं, जिनमें गोश्त का होना ज़रूरी था, लेकिन फलों में आम के लिए उनकी दीवानगी बहुत मशहूर है।
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