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मीर अनीस के मर्सियों (शोकगीतों) में अरब किरदारों को हिंदुस्तानी तहज़ीब के साँचे में ढालना कोई ऐतिहासिक ख़ामी (कमी) नहीं, बल्कि एक महान काव्य और रचनात्मक ज़रूरत थी।
यह लेख फ़िराक़ गोरखपुरी के मशहूर रुबाइयों के संग्रह 'रूप' के हवाले से हिंदुस्तानी औरत, ममता और घरेलू मोहब्बत के चित्रण पर आधारित है।
ग़ज़ल की बनावट, उसकी 'रेज़ा-ख़याली' (बिखरे विचारों) और जुड़ाव व निरंतरता की कमी पर कलीमउद्दीन अहमद और अज़मतउल्लाह ख़ाँ की आलोचनाओं का जायज़ा, और ग़ज़ल के बचाव में पूर्वी कला दृष्टिकोण की अहमियत।
मीर तक़ी मीर को 'ख़ुदा-ए-सुख़न' क्यों कहा जाता है? यह ख़िताब महज़ एक तारीफ़ नहीं है, बल्कि शायरी की तमाम अस्नाफ़ (विधाओं ) पर मीर की मुकम्मल महारत का सुबूत है।