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aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair

jis ke hote hue hote the zamāne mere

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आदिल ज़ैदी

आदिल ज़ैदी

नज़्म 3

 

अशआर 11

मात खाई है अक्सर शाह ने प्यादे से

फ़र्क़ कुछ नहीं पड़ता ताज और लिबादे से

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अपने रस्म-ओ-रिवाज खो बैठे

बाक़ी अब ख़ानदान में क्या है

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हाल पूछते क्या हो क़िस्सा मुख़्तसर ये है

घर बन सका अब तक जो मकाँ बनाया था

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वार पुश्त पर करके क्या मिला तुम्हें आख़िर

एक पल में खो बैठे ए'तिबार जितना था

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आँख लगने पाई सहर हो गई

ज़िंदगी बे-इरादा बसर हो गई

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