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aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair

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अंदलीब शादानी

1904 - 1969 | ढाका, बंगलादेश

रोमानी ग़ज़ल के शायर, अनुवादक, संपादक अपनी ग़ज़ल " देर लगी आने में लेकिन ..." के लिए प्रसिद्ध

रोमानी ग़ज़ल के शायर, अनुवादक, संपादक अपनी ग़ज़ल " देर लगी आने में लेकिन ..." के लिए प्रसिद्ध

अंदलीब शादानी के शेर

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देर लगी आने में तुम को शुक्र है फिर भी आए तो

आस ने दिल का साथ छोड़ा वैसे हम घबराए तो

देर लगी आने में तुम को शुक्र है फिर भी आए तो

आस ने दिल का साथ छोड़ा वैसे हम घबराए तो

उफ़ वो तूफ़ान-ए-शबाब आह वो सीना तेरा

जिसे हर साँस में दब दब के उभरता देखा

उफ़ वो तूफ़ान-ए-शबाब आह वो सीना तेरा

जिसे हर साँस में दब दब के उभरता देखा

दिल पर चोट पड़ी है तब तो आह लबों तक आई है

यूँ ही छन से बोल उठना तो शीशे का दस्तूर नहीं

दिल पर चोट पड़ी है तब तो आह लबों तक आई है

यूँ ही छन से बोल उठना तो शीशे का दस्तूर नहीं

झूट है सब तारीख़ हमेशा अपने को दुहराती है

अच्छा मेरा ख़्वाब-ए-जवानी थोड़ा सा दोहराए तो

झूट है सब तारीख़ हमेशा अपने को दुहराती है

अच्छा मेरा ख़्वाब-ए-जवानी थोड़ा सा दोहराए तो

चाहत के बदले में हम बेच दें अपनी मर्ज़ी तक

कोई मिले तो दिल का गाहक कोई हमें अपनाए तो

चाहत के बदले में हम बेच दें अपनी मर्ज़ी तक

कोई मिले तो दिल का गाहक कोई हमें अपनाए तो

जिगर में टीस लब हँसने पे मजबूर

कुछ ऐसी ही हमारी ज़िंदगी है

जिगर में टीस लब हँसने पे मजबूर

कुछ ऐसी ही हमारी ज़िंदगी है

बे-नियाज़ाना बराबर से गुज़रने वाले

तेज़ कुछ क़ल्ब की रफ़्तार हुई थी कि नहीं

बे-नियाज़ाना बराबर से गुज़रने वाले

तेज़ कुछ क़ल्ब की रफ़्तार हुई थी कि नहीं

तुम चाँदनी हो फूल हो नग़्मा हो शेर हो

अल्लाह-रे हुस्न-ए-ज़ौक़ मिरे इंतिख़ाब का

तुम चाँदनी हो फूल हो नग़्मा हो शेर हो

अल्लाह-रे हुस्न-ए-ज़ौक़ मिरे इंतिख़ाब का

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