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नबिया इरफ़ान

2004 | सहारनपुर, भारत

नबिया इरफ़ान

ग़ज़ल 7

अशआर 7

यूँ तो हादसे भी हुए बहुत मिरी ज़िंदगी में मगर ये क्या

वो जो एक शख़्स 'अज़ीज़ था यूँ ही हादसों सा गुज़र गया

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तेरा ग़ुरूर खा गया तेरे वुजूद को

अब तो ज़रा सी अपनी तू गर्दन झुका के चल

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रहा दिल में तक़द्दुस है तहज़ीब कोई

हो गईं शर्म-ओ-हया से तिरी ख़ाली आँखें

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नश्तर तिरे अल्फ़ाज़ हैं लगते हैं ये दिल पर

गर क़त्ल ही करना है तो इक वार में करना

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ये सारी 'उम्र ही हम ने गुनाहों में गुज़ारी है

गुनाहों से करो तौबा कि अब तौबा की बारी है

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