साग़र ख़य्यामी के शेर
मुद्दत हुई है बिछड़े हुए अपने-आप से
देखा जो आज तुम को तो हम याद आ गए
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जान जाने को है और रक़्स में परवाना है
कितना रंगीन मोहब्बत तिरा अफ़्साना है
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आम तेरी ये ख़ुश-नसीबी है
वर्ना लंगड़ों पे कौन मरता है
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कितने चेहरे लगे हैं चेहरों पर
क्या हक़ीक़त है और सियासत क्या
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उस वक़्त मुझ को दावत-ए-जाम-ओ-सुबू मिली
जिस वक़्त मैं गुनाह के क़ाबिल नहीं रहा
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कौन कहता है बुलंदी पे नहीं हूँ 'साग़र'
मेरी मे'राज-ए-मोहब्बत मिरी रुस्वाई है
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चेहरे तो झुर्रियों से भरे दिल जवान हैं
दिन में हैं शैख़ रात में सलमान-ख़ान हैं
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आई सदा-ए-हक़ कि यही बंद-ओ-बस्त हैं
तेरे वतन के लोग तो मुर्दा-परस्त हैं
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उन के गुनाह क्या कहें किस किस के सर गए
तुम को ख़बर नहीं कई उस्ताद मर गए
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एक क़ैदी सुब्ह को फाँसी लगा कर मर गया
रात भर ग़ज़लें सुनाईं उस को थानेदार ने
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हमारे लाल को दरकार है वही लड़की
कि जिस का बाप पुलिस में हो कम से कम डिप्टी
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जानते हैं दोस्तो! जिन की नज़र बारीक है
बस के दरवाज़ा से जन्नत किस क़दर नज़दीक है
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आख़िर को मैं ने चर्ब-ज़बानी से हार कर
ये कह दिया कि ठीक है कुत्ते से प्यार कर
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आदमी शैतान से आगे है हर हर ऐब में
रहने को अच्छा मकाँ है और जन्नत जेब में
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वो ही मक़ाम-ए-'ग़ालिब'-ओ-'इक़बाल' पाएँगे
मोटी दुमों के सामने जो दुम हिलाएँगे
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कहते थे मैच देखने वाले पुकार के
उस्ताद जा रहे हैं शब-ए-ग़म गुज़ार के
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वो ज़बाँ जो है 'फ़िराक़' ओ 'शाद' ओ 'शंकर' की ज़बाँ
उस ज़बाँ की क्यूँ मुसलमानी किए देते हैं आप
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जो थे अरुज़-दाँ वो रिवायत में बंद थे
बे-बहरा जो गधे थे तरक़्क़ी-पसंद थे
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मेहंदी लगे वो हाथ वो मीना सी उँगलियाँ
हम को तबाह कर गईं दिल्ली की लड़कियाँ
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अब वो ज़माना आएगा महवश कमाएँगे
और मर्द घर पे बैठ के खाना पकाएँगे
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दीवानगी में चाक गरेबाँ किए हुए
लैला मिलेगी बाल परेशाँ किए हुए
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देखे जो क़ैस हुस्न तो लैला को भूल जाए
हम क्या हैं रीश-ए-हज़रत-मौलाना झूल जाए
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उर्दू अदब में जो भी हमारा मक़ाम है
उस्ताद-ए-मोहतरम के वो भेजे का काम है
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पूरी दुनिया में हुकूमत जो ज़नानी होती
आलमी जंग जो होती तो ज़बानी होती
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मैं ने कहा कि कुत्ते के खाने का केक है
बोला यहीं पे खाओगे या ले के जाओगे
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कहने लगी ये मौत कि कीजे हमें मुआफ़
अल्लाह शायरों के हमेशा से है ख़िलाफ़
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उस्ताद कह रहे थे छुरा दिल पे चल गया
दुम पर हमारी पाँव वो रख कर निकल गया
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कहने लगी हैं जब से ग़ज़ल औरतें जनाब
मुर्दों से गुफ़्तुगू का ग़ज़ल नाम हो गया
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अब आप ही बताएँ वो कैसे निभाएगा
जिस को नसीब दुम नहीं वो क्या हिलाए गा
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करवटों से बस की बस में और हलचल हो गई
दास्तान-ए-इश्क़ कितनों की मुकम्मल हो गई
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महँगाई के ज़माने में बच्चों की रेल-पेल
ऐसा न हो कमर तिरी महँगाई तोड़ दे
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शब भर मैं टार्च डाल के ये देखता रहा
बिजली का बल्ब जलता है या है बुझा हुआ
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तजरबा मुझ को हुआ है दोस्तो! इस ख़्वाब से
मुस्तक़िल चपरासी अच्छा टेम्परेरी जॉब से
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मौसम को देख-भाल के फ़ाइल बढ़ाए हैं
दफ़्तर में लड़कियाँ भी तो सुइटर बनाए हैं
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इशारा हो तो मैं रुख़ मोड़ दूँ ज़माने का
बना दूँ तुम को मैनेजर यतीम-ख़ाने का
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आई आवाज़-ए-ख़ुदावंद दिए देते हैं
दाख़िला तेरा जे.एन.यू में किए देते हैं
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मायूस न हूँ आशिक़ मिल जाएगी माशूक़ा
बस इतनी सी ज़हमत है मोबाइल उठाना है
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किस से कहिए झाँकिए अपने गरेबाँ में ज़रा
जिस को कहते हैं गरेबाँ वो तो रोशन-दान है
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