हौसला है तो सफ़ीनों के अलम लहराओ
बहते दरिया तो चलेंगे इसी रफ़्तार के साथ
शजर ने पूछा कि तुझ में ये किस की ख़ुशबू है
हवा-ए-शाम-ए-अलम ने कहा उदासी की
हिम्मत है तो बुलंद कर आवाज़ का अलम
चुप बैठने से हल नहीं होने का मसअला
हम हैं तहज़ीब के अलम-बरदार
हम को उर्दू ज़बान आती है
हमारी फ़त्ह के अंदाज़ दुनिया से निराले हैं
कि परचम की जगह नेज़े पे अपना सर निकलता है
वो हिन्दी नौजवाँ यानी अलम-बरदार-ए-आज़ादी
वतन की पासबाँ वो तेग़-ए-जौहर-दार-ए-आज़ादी
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इन दिनों अपनी भी वहशत का अजब आलम है
घर में हम दश्त-ओ-बयाबान उठा लाए हैं
वो ग़म हो या अलम हो दर्द हो या आलम-ए-वहशत
उसे अपना समझ ऐ ज़िंदगी जो तेरे काम आए
अव्वल अहल-ए-क़बीला ने परचम बनाया उसे और फिर
पेश-ए-दुश्मन भी तावान में सिर्फ़ मेरी रिदा ले गए