उसी 'इक़बाल' की मैं जुस्तुजू करता रहा बरसों
बड़ी मुद्दत के बा'द आख़िर वो शाहीं ज़ेर-ए-दाम आया
मैं बरसों तक उसी इक़बाल की खोज करता रहा, जिसकी मुझे चाह थी।
बहुत समय बाद आखिर वह शाहीन मेरे काबू में, मेरी पकड़ में आ गया।
यह दोहा/शेर लंबे संघर्ष और लक्ष्य-प्राप्ति का भाव रखता है। “इक़बाल” यहाँ ऊँचाई, सफलता और भीतर की जागी हुई ताक़त का संकेत है, और “शाहीन” उस ऊँची उड़ान वाली, स्वतंत्र हिम्मत का रूपक है। “ज़ेर-ए-दाम” का मतलब है कि बहुत कोशिश के बाद वह चीज़/हालत इंसान की पकड़ में आ जाती है। भावनात्मक केंद्र बेचैनी से संतोष और जीत तक पहुँचता है।