एक परिंदा चीख़ रहा है मस्जिद के मीनारे पर
दूर कहीं गंगा के किनारे आस का सूरज ढलता है
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टैग्ज़ : गंगा जमुनी तहज़ीबऔर 1 अन्य
ये मिसरा लिख दिया किस शोख़ ने मेहराब-ए-मस्जिद पर
ये नादाँ गिर गए सज्दों में जब वक़्त-ए-क़याम आया
Interpretation:
Rekhta AI
इस शेर में व्यंग्य के जरिए दिखाया गया है कि कुछ लोग धर्म को समझकर नहीं, बस रस्म की तरह निभाते हैं। मेहराब पर लिखा वाक्य उनके भ्रम को उजागर कर देता है। नमाज़ में जिस वक्त खड़ा होना चाहिए, उसी वक्त सज्दा कर देना उनकी नासमझी और अंधी नकल का संकेत है। भाव यह है कि इबादत जागरूकता और सही समझ के साथ होनी चाहिए।
पुख़्ता कर ले ऐ ज़ाहिद अपना ईमाँ
मस्जिद से पहले मय-ख़ाना पड़ता है