ज़िंदगी पर दोहे
ज़िंदगी को परिभाषित करना
मुहाल है । शायद इसलिए शाइर ज़िंदगी को जितने ज़ावियों और सूरतों में देखता है, उस को अपने तौर पर पेश करता है । ज़िंदगी के हुस्न की कहानी हो या उस की बद-सूरती का बयान सब को उर्दू शाइरी अपने दामन में समेट कर चलती है । इस का अंदाज़ा यहाँ प्रस्तुत संकलन से लगाया जा सकता है ।
मैं भी तू भी यात्री चलती रुकती रेल
अपने अपने गाँव तक सब का सब से मेल
मैं भी तू भी यात्री चलती रुकती रेल
अपने अपने गाँव तक सब का सब से मेल
हम जग में कैसे रहे ज़रा दीजिए ध्यान
रात गुज़ारी जिस तरह दुश्मन-घर मेहमान
हम जग में कैसे रहे ज़रा दीजिए ध्यान
रात गुज़ारी जिस तरह दुश्मन-घर मेहमान