ज़िंदगी पर चित्र/छाया शायरी

ज़िंदगी को परिभाषित करना

मुहाल है । शायद इसलिए शाइर ज़िंदगी को जितने ज़ावियों और सूरतों में देखता है, उस को अपने तौर पर पेश करता है । ज़िंदगी के हुस्न की कहानी हो या उस की बद-सूरती का बयान सब को उर्दू शाइरी अपने दामन में समेट कर चलती है । इस का अंदाज़ा यहाँ प्रस्तुत संकलन से लगाया जा सकता है ।

तुम मोहब्बत को खेल कहते हो

उम्र-ए-दराज़ माँग के लाई थी चार दिन

'मीर' अमदन भी कोई मरता है

ये माना ज़िंदगी है चार दिन की

ये माना ज़िंदगी है चार दिन की

ज़िंदगी क्या है आज इसे ऐ दोस्त

होश वालों को ख़बर क्या बे-ख़ुदी क्या चीज़ है

हर एक ग़म निचोड़ के हर इक बरस जिए

सैर कर दुनिया की ग़ाफ़िल ज़िंदगानी फिर कहाँ

तुम मोहब्बत को खेल कहते हो

ज़िंदगी एक फ़न है लम्हों को

सैर कर दुनिया की ग़ाफ़िल ज़िंदगानी फिर कहाँ

ये माना ज़िंदगी है चार दिन की

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