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शेख़ इब्राहीम ज़ौक़ के शेर
तुम भूल कर भी याद नहीं करते हो कभी
हम तो तुम्हारी याद में सब कुछ भुला चुके
Interpretation:
Rekhta AI
इस शेर में शायर महबूब की बेरुखी और अपनी दीवानगी के बीच का अंतर दिखा रहे हैं। शायर शिकायत करता है कि महबूब उसे कभी धोखे से भी याद नहीं करता, जबकि उसने महबूब की यादों में खोकर बाकी पूरी दुनिया को भुला दिया है। यह सच्चे प्रेम में खुद को मिटा देने की भावना को दर्शाता है।
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अब तो घबरा के ये कहते हैं कि मर जाएँगे
मर के भी चैन न पाया तो किधर जाएँगे
Interpretation:
Rekhta AI
शायर जिंदगी के दुखों से तंग आकर मौत को ही आखिरी रास्ता मानता है, लेकिन उसे तुरंत एक डर सताता है। वह सोचता है कि अगर मरने के बाद भी उसे सुकून नहीं मिला, तो उसके पास जाने के लिए कोई जगह नहीं बचेगी। यह शेर नाउम्मीदी की उस हालत को दिखाता है जहाँ इंसान को मुक्ति का कोई भी रास्ता नहीं दिखता।
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मरज़-ए-इश्क़ जिसे हो उसे क्या याद रहे
न दवा याद रहे और न दुआ याद रहे
Interpretation:
Rekhta AI
कवि कहते हैं कि प्रेम एक ऐसा गहरा रोग है जो इंसान को पूरी तरह दुनिया से बेखबर कर देता है। प्रेमी अपने प्रिय की याद में इतना डूब जाता है कि उसे अपनी तकलीफ दूर करने के लिए न तो दवाई की सुध रहती है और न ही वह ईश्वर से प्रार्थना करना याद रख पाता है।
ज़ाहिद शराब पीने से काफ़िर हुआ मैं क्यूँ
क्या डेढ़ चुल्लू पानी में ईमान बह गया
EXPLANATION #1
यह शे’र मायनी और लक्षण दोनों दृष्टि से दिलचस्प है। शे’र में वही शब्द इस्तेमाल किए गए हैं, जिन्हें उर्दू ग़ज़ल की परम्परा की विशेषता समझा जाता है। जैसे ज़ाहिद-ए-शराब, काफ़िर, ईमान। मगर मायनी की सतह पर ज़ौक़ ने व्यंग्य के लहजे से जो बात पैदा की है वो पाठक को चौंका देती है। शे’र में ज़ाहिद के सम्बंध से शराब, काफ़िर के सम्बंध से ईमान के अलावा पीने, पानी और बहने से जो स्थिति पैदा हुई है वो अपने आप में एक शायराना कमाल है। ज़ाहिद उर्दू ग़ज़ल की परम्परा में उन पात्रों में से एक है जिन पर शायरों ने खुल कर तंज़ किए हैं।
शे’र के किरदार ज़ाहिद से सवाल पूछता है कि शराब पीने से आदमी काफ़िर कैसे हो सकता है, क्या ईमान इस क़दर कमज़ोर चीज़ होती है कि ज़रा से पानी के साथ बह जाती है। इस शे’र के पंक्तियों के बीच में ज़ाहिद पर जो तंज़ किया गया है वो “डेढ़ चुल्लू” पानी से स्पष्ट होता है। यानी मैंने तो ज़रा सी शराब पी ली है और तुमने मुझ पर काफ़िर होने का फ़तवा जारी कर दिया। क्या तुम्हारी नज़र में ईमान इतनी कमज़ोर चीज़ है कि ज़रा सी शराब पीने से ख़त्म हो जाती है।
शफ़क़ सुपुरी
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ऐ 'ज़ौक़' तकल्लुफ़ में है तकलीफ़ सरासर
आराम में है वो जो तकल्लुफ़ नहीं करता
EXPLANATION #1
यह ज़ौक़ का एक ख़ूबसूरत शे’र है और इसमें ज़ौक़ ने एक अहम नुक्ते वाली बात बताई है। हालांकि इस शे’र का अहम लफ़्ज़ तकल्लुफ़ है मगर तकलीफ़ और तकल्लुफ़ की रियायत भी खूब मज़ा देती है।
ज़ौक़ इस शे’र में तकल्लुफ़ यानी बनावट की नई बात पर रौशनी डालते हैं। बनावट वो चीज़ होती है जिसमें हक़ीक़त न हो यानी जो बनावटी हो। बनावट ज़िंदगी के सारे मामले में भी होती है और रिश्तों में भी। आम मामले में बनावट से तात्पर्य ये है कि आदमी अपनी वो हैसियत दिखाने की कोशिश करे जो वो नहीं है और रिश्तों में बनावट से तात्पर्य ऐसी भावनाओं को प्रगट करना जो वास्तविक न हों। बहरहाल मामला जो भी है अगर इंसान आम मामले में बनावट से काम ले तो ख़ुद को ही नुक़्सान पहुँचाता है और अगर रिश्तों में बनावट से काम ले तो एक न एक दिन तो बनावट खुल ही जाती है फिर रिश्ते टूट जाते हैं।
ज़ौक़ कहते कि दरअसल बनावट और दिखावा एक भरपूर तकलीफ़ है और जो आदमी बनावट से काम नहीं लेता हालांकि वक़्ती तौर पर उसे तकलीफ़ महसूस होती है मगर आख़िरकार वह आराम में होता है। इसलिए इंसान को दिखावे से बचना चाहिए।
शफ़क़ सुपुरी
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ऐ 'ज़ौक़' देख दुख़्तर-ए-रज़ को न मुँह लगा
छुटती नहीं है मुँह से ये काफ़र लगी हुई
Interpretation:
Rekhta AI
इस शेर में शायर ने शराब की लत से बचने की सलाह दी है। शराब को 'दुख़्तर-ए-रज़' और 'काफ़िर' कहकर पुकारा गया है, जिसका मतलब है कि यह एक ऐसी जालिम चीज़ है जो अगर एक बार आदत बन जाए तो छूटती नहीं है। इसमें नशे की बुराई और उसकी मज़बूत पकड़ को दर्शाया गया है।
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इन दिनों गरचे दकन में है बड़ी क़द्र-ए-सुख़न
कौन जाए 'ज़ौक़' पर दिल्ली की गलियाँ छोड़ कर
Interpretation:
Rekhta AI
शायर कहता है कि भले ही दक्कन में कलाकारों को बहुत सम्मान मिल रहा है और वहां कला का बोलबाला है। फिर भी, दिल्ली शहर से उनका लगाव इतना गहरा है कि वे धन और शोहरत के लिए दिल्ली की गलियों को छोड़कर जाने के बारे में सोच भी नहीं सकते।
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टैग : दिल्ली
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'ज़ौक़' जो मदरसे के बिगड़े हुए हैं मुल्ला
उन को मय-ख़ाने में ले आओ सँवर जाएँगे
Interpretation:
Rekhta AI
इस शेर में शायर ने धार्मिक दिखावे पर कटाक्ष किया है। उनका मानना है कि मदरसे की किताबी पढ़ाई ने मुल्लाओं को घमंडी बना दिया है, जबकि मयखाना (प्रेम और मस्ती की जगह) उनके अहंकार को मिटाकर उन्हें विनम्रता सिखाएगा, जिससे उनका चरित्र सँवर जाएगा।
एक आँसू ने डुबोया मुझ को उन की बज़्म में
बूँद भर पानी से सारी आबरू पानी हुई
Interpretation:
Rekhta AI
शायर कहता है कि महबूब की महफिल में मैं अपने जज़्बात काबू में न रख सका और एक आँसू निकल पड़ा। उस एक बूँद ने मुझे 'डुबो' दिया, यानी मेरी सारी इज्ज़त पानी में मिल गई; यहाँ 'पानी होना' मुहावरे का प्रयोग इज्ज़त जाने और शर्मिंदा होने के लिए किया गया है।
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बजा कहे जिसे आलम उसे बजा समझो
ज़बान-ए-ख़ल्क़ को नक़्क़ारा-ए-ख़ुदा समझो
Interpretation:
Rekhta AI
इस शेर में जनमत या 'पब्लिक ओपिनियन' की ताकत को बताया गया है। शायर का मानना है कि जब सारी दुनिया किसी बात को सही मानती है, तो वह ईश्वरीय संकेत के समान होता है। लोगों की सामूहिक आवाज़ को ईश्वर का आदेश मानकर स्वीकार करना चाहिए।
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मालूम जो होता हमें अंजाम-ए-मोहब्बत
लेते न कभी भूल के हम नाम-ए-मोहब्बत
Interpretation:
Rekhta AI
इस शेर में शायर प्यार में मिलने वाले दुखों से परेशान होकर पछतावा जाहिर कर रहे हैं। उनका कहना है कि इश्क का अंजाम इतना दर्दनाक है कि अगर हमें पहले से खबर होती, तो हम प्यार करना तो दूर, उसका नाम लेने से भी बचते।
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हम रोने पे आ जाएँ तो दरिया ही बहा दें
शबनम की तरह से हमें रोना नहीं आता
Interpretation:
Rekhta AI
इस शेर में शेख़ इब्राहीम ज़ौक़ अपने दुःख की गहराई को बढ़ा-चढ़ाकर बता रहे हैं। उनका कहना है कि वह ओस की तरह चुपचाप या कम नहीं रो सकते; उनका दर्द इतना ज़्यादा है कि जब वह रोते हैं तो मानो बाढ़ आ जाती है, वे खुल कर अपने जज़्बात जाहिर करने में यकीन रखते हैं।
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लाई हयात आए क़ज़ा ले चली चले
अपनी ख़ुशी न आए न अपनी ख़ुशी चले
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Rekhta AI
यह शेर इंसान की बेबसी और जीवन-मरण पर उसके वश न होने की हकीकत बयां करता है। कवि कहते हैं कि जन्म और मृत्यु दोनों ही हमारे हाथ में नहीं हैं, हम तो बस नियति के खेल का हिस्सा हैं। न आना हमारे वश में था और न जाना हमारी मर्जी से हो रहा है, सब कुछ पहले से तय है।
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कितने मुफ़लिस हो गए कितने तवंगर हो गए
ख़ाक में जब मिल गए दोनों बराबर हो गए
Interpretation:
Rekhta AI
यह शेर बताता है कि अमीरी और गरीबी का भेद केवल जीवन तक ही सीमित है। कवि कहते हैं कि मौत सबसे बड़ा इन्साफ करने वाली है जो अमीर और गरीब को एक स्तर पर ले आती है। अंत में, हर इंसान को मिट्टी में ही मिल जाना है, चाहे उसका रुतबा कुछ भी हो।
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फूल तो दो दिन बहार-ए-जाँ-फ़ज़ा दिखला गए
हसरत उन ग़ुंचों पे है जो बिन खिले मुरझा गए
Interpretation:
Rekhta AI
शायर कहता है कि फूल, भले ही कम समय के लिए रहे हों, उन्होंने अपनी सुंदरता से दुनिया को खुश तो किया। असली दुख उन कलियों का है जो फूल बनने से पहले ही खत्म हो गईं, जो उन लोगों का प्रतीक हैं जिनकी प्रतिभा या जीवन समय से पहले समाप्त हो गया।
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आदमिय्यत और शय है इल्म है कुछ और शय
कितना तोते को पढ़ाया पर वो हैवाँ ही रहा
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Rekhta AI
शायर यहाँ ज्ञान और इंसानियत (अच्छे व्यवहार) के बीच का अंतर समझा रहे हैं। उनका कहना है कि सिर्फ़ ज्ञान पा लेने से कोई अच्छा इंसान नहीं बन जाता, जैसे तोते को रटाने के बाद भी वह जानवर ही रहता है। असली महत्त्व अच्छे स्वभाव और मनुष्यता का है, केवल रटने या पढ़ने का नहीं।
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बेहतर तो है यही कि न दुनिया से दिल लगे
पर क्या करें जो काम न बे-दिल-लगी चले
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Rekhta AI
शायर कहता है कि समझदारी इसी में है कि दुनिया से मोह-माया न रखी जाए, लेकिन इंसान मजबूर है। जीवन जीने के लिए और दुनिया के कामकाज चलाने के लिए कहीं न कहीं मन का जुड़ना और थोड़ी बहुत दिलचस्पी लेना ज़रूरी हो जाता है। बिना लगाव के ज़िंदगी नीरस और रुकी हुई लगती है।
नाज़ है गुल को नज़ाकत पे चमन में ऐ 'ज़ौक़'
उस ने देखे ही नहीं नाज़-ओ-नज़ाकत वाले
Interpretation:
Rekhta AI
शायर कहता है कि गुलाब का अपनी कोमलता पर इतराना बेकार है। यह घमंड केवल इसलिए है क्योंकि उसने अब तक महबूब की असली सुंदरता और नज़ाकत को नहीं देखा है। महबूब के सामने फूल की कोमलता कुछ भी नहीं है।
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बोसा जो रुख़ का देते नहीं लब का दीजिए
ये है मसल कि फूल नहीं पंखुड़ी सही
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Rekhta AI
शायर अपने महबूब से बड़ी चतुराई से प्रेम की मांग कर रहा है। वह तर्क देता है कि चेहरा फूल जैसा है और होंठ पंखुड़ी जैसे, इसलिए अगर गाल (फूल) का बोसा नहीं मिल सकता, तो 'समझौते' के तौर पर होंठ (पंखुड़ी) का बोसा ही दे दें।
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टैग : किस
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मस्जिद में उस ने हम को आँखें दिखा के मारा
काफ़िर की शोख़ी देखो घर में ख़ुदा के मारा
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Rekhta AI
यह शेर प्रेमी की निडरता और माशूक की नज़रों की ताक़त को दिखाता है। शायर अपने महबूब को मज़ाक में 'काफ़िर' (अधर्मी) कहते हैं क्योंकि उसने मस्जिद जैसी पवित्र जगह का भी लिहाज़ नहीं किया और वहाँ भी अपनी नज़रों के वार से प्रेमी को घायल कर दिया।
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ऐ शम्अ तेरी उम्र-ए-तबीई है एक रात
हँस कर गुज़ार या इसे रो कर गुज़ार दे
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Rekhta AI
शायर मोमबत्ती का उदाहरण देकर समझा रहे हैं कि जीवन बहुत छोटा है, जैसे शमा की उम्र बस एक रात की होती है। जब अंत निश्चित है और समय कम है, तो दुख मनाने से समय नहीं रुकेगा। यह शेर हमें सीख देता है कि जीवन की इस छोटी सी अवधि को रोने के बजाय खुशी और हिम्मत से बिताना चाहिए।
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न हुआ पर न हुआ 'मीर' का अंदाज़ नसीब
'ज़ौक़' यारों ने बहुत ज़ोर ग़ज़ल में मारा
Interpretation:
Rekhta AI
इस शेर में ज़ौक़ ने महान शायर मीर तक़ी 'मीर' के आगे अपनी और अपने साथियों की हार मानी है। वे कहते हैं कि ग़ज़ल कहने में लोगों ने बहुत मेहनत की और पूरा जोर लगा दिया, लेकिन मीर जैसा जादुई अंदाज़ किसी के हिस्से में नहीं आया। यह शेर मीर की श्रेष्ठता को दर्शाता है।
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क्या जाने उसे वहम है क्या मेरी तरफ़ से
जो ख़्वाब में भी रात को तन्हा नहीं आता
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Rekhta AI
शायर अपने महबूब की अत्यधिक सावधानी और शक की शिकायत कर रहा है। महबूब शायर से इतना बचता है कि सपने में भी, जहाँ एकांत होना चाहिए, वह किसी न किसी को साथ लेकर आता है ताकि शायर के साथ अकेला न रहना पड़े।
क्या देखता है हाथ मिरा छोड़ दे तबीब
याँ जान ही बदन में नहीं नब्ज़ क्या चले
Interpretation:
Rekhta AI
शायर हकीम से कहता है कि मेरा इलाज करना बेकार है, इसलिए मेरी कलाई छोड़ दो। दुख और पीड़ा ने मुझे इतना बेजान कर दिया है कि मेरे शरीर में जान ही नहीं बची, और जब जान ही नहीं तो नब्ज़ (नाड़ी) का चलना नामुमकिन है।
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हक़ ने तुझ को इक ज़बाँ दी और दिए हैं कान दो
इस के ये मअ'नी कहे इक और सुने इंसान दो
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Rekhta AI
शायर कहता है कि कुदरत ने इंसान के शरीर की बनावट ही ऐसी रखी है जिससे हमें जीने का तरीका समझ आए। एक जीभ और दो कानों का होना यह इशारा करता है कि समझदार इंसान को कम बोलना चाहिए और ज्यादा सुनना चाहिए, ताकि उसका ज्ञान बढ़ सके।
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दुनिया ने किस का राह-ए-फ़ना में दिया है साथ
तुम भी चले चलो यूँही जब तक चली चले
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Rekhta AI
शायर समझा रहे हैं कि दुनिया का साथ केवल जीवन तक है, मृत्यु के समय सब कुछ यहीं छूट जाता है। इसलिए जब तक साँस है, इंसान को बिना ज्यादा चिंता किए बस समय के साथ बहते रहना चाहिए और जीवन को वैसे ही जीना चाहिए जैसे वह मिल रहा है।
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टैग : दुनिया
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हम नहीं वो जो करें ख़ून का दावा तुझ पर
बल्कि पूछेगा ख़ुदा भी तो मुकर जाएँगे
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Rekhta AI
शायर प्रेम में त्याग की चरम सीमा को दर्शाता है, जहाँ प्रेमी अपने प्रियतम को किसी भी सज़ा से बचाना चाहता है। वह कहता है कि प्रलय के दिन (कयामत) अगर ईश्वर भी इंसाफ करना चाहें, तो मैं तुम्हारी रक्षा के लिए झूठ बोल दूँगा और अपनी हत्या का आरोप तुम पर नहीं आने दूँगा।
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रहता सुख़न से नाम क़यामत तलक है 'ज़ौक़'
औलाद से रहे यही दो पुश्त चार पुश्त
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Rekhta AI
कवि का कहना है कि शरीर और वंश नश्वर हैं, लेकिन कला और साहित्य अमर हैं। जहाँ संतान से प्राप्त नाम कुछ पीढ़ियों के बाद भुला दिया जाता है, वहीं कवि के शब्द उसे दुनिया के अंत तक जीवित रखते हैं। यह शेर रचना की शक्ति को वंश की शक्ति से श्रेष्ठ बताता है।
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रुलाएगी मिरी याद उन को मुद्दतों साहब
करेंगे बज़्म में महसूस जब कमी मेरी
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Rekhta AI
शायर का कहना है कि मेरे चले जाने के बाद ही दोस्तों को मेरा महत्व समझ आएगा। जब महफिल में उन्हें मेरा खालीपन खटकेगा, तो वे मेरी कमी को महसूस करेंगे और मेरी याद में काफ़ी समय तक आंसू बहाएंगे।
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तुम जिसे याद करो फिर उसे क्या याद रहे
न ख़ुदाई की हो परवा न ख़ुदा याद रहे
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Rekhta AI
शायर कहता है कि जब प्रियतम या ईश्वर किसी पर अपनी कृपा-दृष्टि डालता है, तो वह इंसान उस प्रेम में इतना डूब जाता है कि उसे अपनी सुध-बुध नहीं रहती। इस बेहोशी के आलम में उसे न तो दुनिया (ख़ुदाई) का कोई होश रहता है और न ही वह अलग से ईश्वर को याद करता है, क्योंकि वह उसी ध्यान में पूरी तरह खो जाता है।
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टैग : याद
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तवाज़ो का तरीक़ा साहिबो पूछो सुराही से
कि जारी फ़ैज़ भी है और झुकी जाती है गर्दन भी
Interpretation:
Rekhta AI
शायर ने सुराही का उदाहरण देकर यह बताया है कि असली बड़प्पन विनम्रता में है। जैसे सुराही जाम भरते समय अपना सिर झुका लेती है, वैसे ही इंसान को दान देते समय या दूसरों की मदद करते समय घमंड नहीं करना चाहिए। देने वाले का हाथ और सिर हमेशा झुका रहना चाहिए।
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वक़्त-ए-पीरी शबाब की बातें
ऐसी हैं जैसे ख़्वाब की बातें
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Rekhta AI
शायर कहता है कि जब इंसान बूढ़ा हो जाता है, तो उसे अपनी जवानी के किस्से हकीकत नहीं लगते। बीते हुए दिन और पुरानी ताकत अब इतनी दूर महसूस होती है कि उन्हें याद करना किसी सपने को याद करने जैसा लगता है, जिसका वर्तमान से कोई वास्ता नहीं।
जो कहोगे तुम कहेंगे हम भी हाँ यूँ ही सही
आप की गर यूँ ख़ुशी है मेहरबाँ यूँ ही सही
Interpretation:
Rekhta AI
इस शेर में शायर अपने महबूब की मर्ज़ी के आगे पूरी तरह झुक जाने की बात कर रहा है। वह कहता है कि मेरे लिए बहस या सच्चाई से ज़्यादा तुम्हारी ख़ुशी मायने रखती है, इसलिए मैं तुम्हारी हर बात मानने को तैयार हूँ।
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ख़त बढ़ा काकुल बढ़े ज़ुल्फ़ें बढ़ीं गेसू बढ़े
हुस्न की सरकार में जितने बढ़े हिन्दू बढ़े
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Rekhta AI
शायर ने यहाँ पुरानी शायरी की परंपरा के अनुसार 'हिन्दू' शब्द का प्रयोग काले रंग के प्रतीक के रूप में किया है। वे कहते हैं कि महबूब के चेहरे पर काले बालों का प्रभाव बढ़ गया है, जिसे देखकर लगता है कि हुस्न की सरकार में केवल काले बालों (हिन्दुओं) की ही तरक्की हो रही है।
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सब को दुनिया की हवस ख़्वार लिए फिरती है
कौन फिरता है ये मुर्दार लिए फिरती है
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शायर कहता है कि दुनिया का मोह इंसान को जलील करता है। लोग यह समझते हैं कि वे अपनी मर्जी से चल रहे हैं, लेकिन असल में सांसारिक लालच (जिसे मुर्दार या शव कहा गया है) उन्हें अपने पीछे-पीछे अपमानजनक स्थिति में घसीट रहा है।
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कहते हैं आज 'ज़ौक़' जहाँ से गुज़र गया
क्या ख़ूब आदमी था ख़ुदा मग़्फ़िरत करे
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Rekhta AI
कवि अपनी ही मृत्यु की कल्पना करते हुए बताता है कि उसके जाने के बाद लोग कैसे उसे याद करेंगे। यह शेर दर्शाता है कि अक्सर इंसान की अच्छाई की कद्र और उसके लिए दुआएं उसके मरने के बाद ही की जाती हैं।
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बे-क़रारी का सबब हर काम की उम्मीद है
ना-उमीदी हो तो फिर आराम की उम्मीद है
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Rekhta AI
शायर का कहना है कि जब तक हम नतीजों की उम्मीद लगाए रखते हैं, हमारा मन बेचैन रहता है। सच्चा आराम और मानसिक शांति तभी मिलती है जब हम उम्मीदें छोड़ दें, क्योंकि इच्छाओं और अपेक्षाओं का अंत ही असली सुख है।
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गया शैतान मारा एक सज्दे के न करने में
अगर लाखों बरस सज्दे में सर मारा तो क्या मारा
Interpretation:
Rekhta AI
कवि कहते हैं कि ईश्वर की आज्ञा का पालन करना सालों की तपस्या से ज़्यादा ज़रूरी है। शैतान ने लाखों साल भक्ति की, लेकिन जब उसने अहंकार में आकर एक हुक्म नहीं माना, तो उसकी सारी मेहनत बेकार हो गई। यह शेर बताता है कि घमंड इंसान की सारी अच्छाइयों को मिटा देता है।
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हो उम्र-ए-ख़िज़्र भी तो हो मालूम वक़्त-ए-मर्ग
हम क्या रहे यहाँ अभी आए अभी चले
Interpretation:
Rekhta AI
शायर जीवन के क्षणभंगुर होने की बात कर रहा है। वह कहता है कि हज़ारों साल जीने वाले को भी अंत समय में यही लगेगा कि जीवन बस एक पल का था। ऐसा प्रतीत होता है कि जन्म और मृत्यु के बीच कोई समय ही नहीं बीता; हम अभी आए और अभी चल दिए।
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देख छोटों को है अल्लाह बड़ाई देता
आसमाँ आँख के तिल में है दिखाई देता
Interpretation:
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शायर कहता है कि ईश्वर की लीला विचित्र है, वह छोटों को बड़ा रुतबा दे सकता है। इसकी मिसाल यह है कि आँख की पुतली (तिल) आकार में बहुत छोटी होती है, फिर भी वह अपने अंदर विशाल आसमान का नज़ारा समा लेती है। यह शेर बताता है कि शारीरिक आकार नहीं, बल्कि आंतरिक क्षमता मायने रखती है।
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शुक्र पर्दे ही में उस बुत को हया ने रक्खा
वर्ना ईमान गया ही था ख़ुदा ने रक्खा
Interpretation:
Rekhta AI
शायर अपने महबूब को एक सुंदर 'मूर्ति' (बुत) बताता है जिसे देखकर इंसान ईश्वर को भूल सकता है। वह कहता है कि गनीमत है महबूब ने पर्दा किया हुआ था, वरना उसकी सुंदरता देखकर मैं उसे ही पूजने लगता और मेरा धर्म भ्रष्ट हो जाता। यह एक तरह से महबूब के रूप की प्रशंसा है।
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मौत ने कर दिया लाचार वगरना इंसाँ
है वो ख़ुद-बीं कि ख़ुदा का भी न क़ाइल होता
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Rekhta AI
शायर कहता है कि इंसान का अहंकार बहुत बढ़ा हुआ है और उसे केवल अपनी ही पड़ी रहती है। अगर उसे मौत का डर न होता, तो वह खुद को ही सबकुछ समझता और ईश्वर के अस्तित्व को स्वीकार करने से भी इनकार कर देता।
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बाक़ी है दिल में शैख़ के हसरत गुनाह की
काला करेगा मुँह भी जो दाढ़ी सियाह की
Interpretation:
Rekhta AI
कवि ने उन धार्मिक लोगों पर व्यंग्य किया है जो बाहर से पवित्र बनते हैं लेकिन अंदर से भोग-विलास चाहते हैं। शेख ने अपनी सफ़ेद दाढ़ी तो काली कर ली है ताकि जवान दिखें, लेकिन यह बनावटीपन अंततः उनकी बदनामी का कारण बनेगा, जिसे मुहावरे में 'मुँह काला करना' कहा गया है।
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एहसान ना-ख़ुदा का उठाए मिरी बला
कश्ती ख़ुदा पे छोड़ दूँ लंगर को तोड़ दूँ
Interpretation:
Rekhta AI
शायर कहता है कि उसे किसी इंसान या सहारे का एहसान लेना मंजूर नहीं है। वह ईश्वर पर इतना भरोसा करता है कि सुरक्षा के सभी साधन (लंगर) तोड़कर अपनी ज़िंदगी की नाव को पूरी तरह ख़ुदा की मर्जी पर छोड़ने को तैयार है।
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रिंद-ए-ख़राब-हाल को ज़ाहिद न छेड़ तू
तुझ को पराई क्या पड़ी अपनी नबेड़ तू
Interpretation:
Rekhta AI
शायर धर्म का दिखावा करने वालों (ज़ाहिद) से कहता है कि वे दूसरों की कमियों पर उंगली न उठाएं। दूसरों की बुराई देखने के बजाय इंसान को अपने कर्मों पर ध्यान देना चाहिए और अपनी मुक्ति की चिंता करनी चाहिए, क्योंकि आखिर में सबको अपना-अपना हिसाब देना है।
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तू जान है हमारी और जान है तो सब कुछ
ईमान की कहेंगे ईमान है तो सब कुछ
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कवि अपने प्रियतम को अपने प्राण बताता है और कहता है कि जीवन (जान) है तो ही संसार का महत्व है। वह 'ईमान' (धर्म/सच्चाई) की शपथ लेते हुए कहता है कि जैसे ईमान होने से सब कुछ होता है, वैसे ही तुम मेरे लिए सब कुछ हो; यह प्रेम और विश्वास की चरम सीमा है।
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हमें नर्गिस का दस्ता ग़ैर के हाथों से क्यूँ भेजा
जो आँखें ही दिखानी थीं दिखाते अपनी नज़रों से
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शायर ने यहाँ 'नरगिस' के फूल (जो आँख की तरह दिखते हैं) और मुहावरे 'आँखें दिखाना' (गुस्सा करना) का बहुत सुंदर प्रयोग किया है। प्रेमी शिकायत करता है कि अगर महबूब को नाराज़गी ही जाहिर करनी थी, तो फूलों की 'आँखों' के बजाय अपनी असली आँखों से करता, ताकि इसी बहाने उनका दीदार हो जाता और बीच में कोई तीसरा न आता।
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टैग : रक़ीब
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पिला मय आश्कारा हम को किस की साक़िया चोरी
ख़ुदा से जब नहीं चोरी तो फिर बंदे से क्या चोरी
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शायर यहाँ निडरता और खुलेपन की बात कर रहा है। उसका तर्क है कि जब ऊपरवाला (ईश्वर) सब कुछ देख रहा है, तो समाज के डर से छुपकर काम करना व्यर्थ है। यह शेर दिखावे और पाखंड पर चोट करता है कि असली डर ईश्वर का होना चाहिए, बंदों का नहीं।
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पीर-ए-मुग़ाँ के पास वो दारू है जिस से 'ज़ौक़'
नामर्द मर्द मर्द-ए-जवाँ-मर्द हो गया
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शायर कहता है कि आध्यात्मिक गुरु के पास ज्ञान और प्रेम की ऐसी औषधि है जो इंसान के व्यक्तित्व को पूरी तरह बदल देती है। यह दवा एक डरपोक या कमजोर व्यक्ति को साहस देती है और उसे वीरता और उदारता (जवाँ-मर्दी) के सर्वोच्च स्तर तक पहुँचा देती है।
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टैग : शराब
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बा'द रंजिश के गले मिलते हुए रुकता है दिल
अब मुनासिब है यही कुछ मैं बढ़ूँ कुछ तू बढ़े
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शायर कहता है कि झगड़े के बाद एकदम से पहले जैसा प्यार जताना मुश्किल होता है, क्योंकि दिल में थोड़ी झिझक बाकी रह जाती है। ऐसे में समझदारी इसी में है कि दोनों पक्ष अपनी अकड़ छोड़ें और समझौते के लिए बराबरी से एक-दूसरे की तरफ कदम बढ़ाएं।
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