कभी हम चाक तक नहीं पहुँचे
और कभी कूज़ा-गर से टूट गए
मुझे तो इतनी ख़बर है कि मुश्त-ए-ख़ाक था मैं
जो चाक-ए-मोहलत-ए-गिर्या पे रक़्स करता रहा
सर-ब-कफ़ घर से निकलना तो है शर्त-ए-अव्वल
इतना आसान नहीं चाक-गरेबाँ होना
ये कूज़ा-गर ये चाक ये मिट्टी ये आग सब
ज़ो’म-ए-हुनर में देख कहीं के नहीं रहे