हमारी ना-उमीदी का तो है इल्ज़ाम क़िस्मत पर
तुम्हारा मुद्द'आ होता तो मंज़ूर-ए-ख़ुदा होता
मैं तो जैसा भी हूँ सब लोग मुझे जानते हैं
तेरे बारे में भी इक बात सुनी है मैं ने
रेगज़ारों में बीज बो कर हम
अब्र पर तोहमतें लगाते रहे
बहती हवा ने रात जो रौंदा गुलाब को
गुलशन में बाग़बान पे इल्ज़ाम आ गया