तल्ख़ियाँ ख़ून-ए-जिगर की शा'इरी में घोल कर
चंद मिसरे' लाएँ हैं हम भी सुनाने के लिए
ढूँड अफ़्लाक नए और ज़मीनें भी नई
हो ग़ज़ल का तिरी हर शे'र नया हर्फ़-ब-हर्फ़
मुझ को तन्हा छोड़ने वाले तू न कहीं तन्हा रह जाए
जिस पर तुझ को नाज़ है उतना उस का नाम ज़माना है
जब भी देखा है फ़क़त दाग़ नज़र आए मुझे
कितनी हसरत थी तिरा चाँद सा चेहरा देखूँ
कर्बला तो आज भी मिलता है हर हर गाम पर
शहर में लेकिन हुसैन-ए-बा-वफ़ा कोई नहीं