aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair

jis ke hote hue hote the zamāne mere

रद करें डाउनलोड शेर
noImage

अज्ञात

अज्ञात के शेर

141K
Favorite

श्रेणीबद्ध करें

ज़ाहिद शराब पीने दे मस्जिद में बैठ कर

या वो जगह बता दे जहाँ पर ख़ुदा हो

दिल टूटने से थोड़ी सी तकलीफ़ तो हुई

लेकिन तमाम उम्र को आराम हो गया

जान लेनी थी साफ़ कह देते

क्या ज़रूरत थी मुस्कुराने की

ज़िंदगी यूँही बहुत कम है मोहब्बत के लिए

रूठ कर वक़्त गँवाने की ज़रूरत क्या है

बेचैन इस क़दर था कि सोया रात भर

पलकों से लिख रहा था तिरा नाम चाँद पर

किसी को कैसे बताएँ ज़रूरतें अपनी

मदद मिले मिले आबरू तो जाती है

लोग काँटों से बच के चलते हैं

मैं ने फूलों से ज़ख़्म खाए हैं

ईद आई तुम आए क्या मज़ा है ईद का

ईद ही तो नाम है इक दूसरे की दीद का

तुम हँसो तो दिन निकले चुप रहो तो रातें हैं

किस का ग़म कहाँ का ग़म सब फ़ुज़ूल बातें हैं

मिल के होती थी कभी ईद भी दीवाली भी

अब ये हालत है कि डर डर के गले मिलते हैं

मुझ को छाँव में रखा और ख़ुद भी वो जलता रहा

मैं ने देखा इक फ़रिश्ता बाप की परछाईं में

देखा हिलाल-ए-ईद तो आया तेरा ख़याल

वो आसमाँ का चाँद है तू मेरा चाँद है

कुछ ख़ुशियाँ कुछ आँसू दे कर टाल गया

जीवन का इक और सुनहरा साल गया

उन के होने से बख़्त होते हैं

बाप घर के दरख़्त होते हैं

पीता हूँ जितनी उतनी ही बढ़ती है तिश्नगी

साक़ी ने जैसे प्यास मिला दी शराब में

ये तो इक रस्म-ए-जहाँ है जो अदा होती है

वर्ना सूरज की कहाँ सालगिरह होती है

जिन के किरदार से आती हो सदाक़त की महक

उन की तदरीस से पत्थर भी पिघल सकते हैं

हसीन चेहरे की ताबिंदगी मुबारक हो

तुझे ये साल-गिरह की ख़ुशी मुबारक हो

माँगी थी एक बार दुआ हम ने मौत की

शर्मिंदा आज तक हैं मियाँ ज़िंदगी से हम

दुनिया में वही शख़्स है ताज़ीम के क़ाबिल

जिस शख़्स ने हालात का रुख़ मोड़ दिया हो

आसमान तेरे ख़ुदा का नहीं है ख़ौफ़

डरते हैं ज़मीन तिरे आदमी से हम

ग़म वो मय-ख़ाना कमी जिस में नहीं

दिल वो पैमाना है भरता ही नहीं

एक बोसे के तलबगार हैं हम

और माँगें तो गुनहगार हैं हम

पैमाना कहे है कोई मय-ख़ाना कहे है

दुनिया तिरी आँखों को भी क्या क्या कहे है

तन्हाइयाँ तुम्हारा पता पूछती रहीं

शब-भर तुम्हारी याद ने सोने नहीं दिया

इस भरोसे पे कर रहा हूँ गुनाह

बख़्श देना तो तेरी फ़ितरत है

गुज़र तो जाएगी तेरे बग़ैर भी लेकिन

बहुत उदास बहुत बे-क़रार गुज़रेगी

किताबें भी बिल्कुल मेरी तरह हैं

अल्फ़ाज़ से भरपूर मगर ख़ामोश

शाम होते ही चराग़ों को बुझा देता हूँ

दिल ही काफ़ी है तिरी याद में जलने के लिए

ख़ुदा करे ढले धूप तेरे चेहरे की

तमाम उम्र तिरी ज़िंदगी की शाम हो

शाख़ें रहीं तो फूल भी पत्ते भी आएँगे

ये दिन अगर बुरे हैं तो अच्छे भी आएँगे

ये बे-ख़ुदी ये लबों की हँसी मुबारक हो

तुम्हें ये सालगिरह की ख़ुशी मुबारक हो

सलीक़े से हवाओं में जो ख़ुशबू घोल सकते हैं

अभी कुछ लोग बाक़ी हैं जो उर्दू बोल सकते हैं

दिल में तूफ़ान हो गया बरपा

तुम ने जब मुस्कुरा के देख लिया

मैं अपने साथ रहता हूँ हमेशा

अकेला हूँ मगर तन्हा नहीं हूँ

मौत से क्यूँ इतनी वहशत जान क्यूँ इतनी अज़ीज़

मौत आने के लिए है जान जाने के लिए

ऐश के यार तो अग़्यार भी बन जाते हैं

दोस्त वो हैं जो बुरे वक़्त में काम आते हैं

फ़रिश्ते हश्र में पूछेंगे पाक-बाज़ों से

गुनाह क्यूँ किए क्या ख़ुदा ग़फ़ूर था

देखा कोहकन कोई फ़रहाद के बग़ैर

आता नहीं है फ़न कोई उस्ताद के बग़ैर

दोस्ती ख़्वाब है और ख़्वाब की ता'बीर भी है

रिश्ता-ए-इश्क़ भी है याद की ज़ंजीर भी है

शहर में मज़दूर जैसा दर-ब-दर कोई नहीं

जिस ने सब के घर बनाए उस का घर कोई नहीं

ज़िंदगी के उदास लम्हों में

बेवफ़ा दोस्त याद आते हैं

जो देखता हूँ वही बोलने का आदी हूँ

मैं अपने शहर का सब से बड़ा फ़सादी हूँ

पलकों की हद को तोड़ के दामन पे गिरा

इक अश्क मेरे सब्र की तौहीन कर गया

ये हमीं हैं कि तिरा दर्द छुपा कर दिल में

काम दुनिया के ब-दस्तूर किए जाते हैं

गूँजते रहते हैं अल्फ़ाज़ मिरे कानों में

तू तो आराम से कह देता है अल्लाह-हाफ़िज़

वतन की ख़ाक ज़रा एड़ियाँ रगड़ने दे

मुझे यक़ीन है पानी यहीं से निकलेगा

चेहरा खुली किताब है उनवान जो भी दो

जिस रुख़ से भी पढ़ोगे मुझे जान जाओगे

सुना है तेरी महफ़िल में सुकून-ए-दिल भी मिलता है

मगर हम जब तिरी महफ़िल से आए बे-क़रार आए

हम ख़ुदा के कभी क़ाइल ही थे

उन को देखा तो ख़ुदा याद आया

Recitation

Jashn-e-Rekhta | 8-9-10 December 2023 - Major Dhyan Chand National Stadium, Near India Gate - New Delhi

GET YOUR PASS
बोलिए