ये मेरे दिल की हवस दश्त-ए-बे-कराँ जैसी
वो तेरी आँख के तेवर समुंदरों वाले
आप सागर हैं तो सैराब करें प्यासे को
आप बादल हैं तो मुझ दश्त पे साया कीजिए
दश्त फिर क्यों नहीं रहे आबाद
अब्र आज़ाद है हवा महफ़ूज़
गुज़र कर दश्त से 'सालिम' जुनूँ के
सफ़र की आबरू हो जाऊँगा मैं
यक-क़लम काग़ज़-ए-आतिश-ज़दा है सफ़्हा-ए-दश्त
नक़्श-ए-पा में है तब-ए-गर्मी-ए-रफ़्तार हुनूज़
रेगिस्तान की पूरी सतह ऐसी है जैसे कागज़ एक ही बार में आग से झुलस गया हो।
पैरों के निशानों में भी तेज़ चाल की गर्मी अभी तक बनी हुई है।
ग़ालिब ने रेगिस्तान को “पन्ना” और चलने की तीव्रता को आग की तरह दिखाया है, जो गुजरते ही सब कुछ जला देती है। जला हुआ कागज़ उजाड़पन और कठिन अनुभव का संकेत बनता है। लेकिन पैरों के निशानों में बची गर्मी बताती है कि उस जुनून की छाप अब भी बाकी है। यानी वीरानी के भीतर भी बेचैनी की तपिश कायम रहती है।