कोई 'फ़ज़ा' तो मिले हम को क़ाबिल-ए-परवाज़
अब इन हदों में भला बाल-ओ-पर कहाँ खोलें
दिल से निकल कर देखो तो
क्या आलम है बाहर का
मंज़र दिल ओ निगाह के जब हो गए उदास
ये बे-फ़ज़ा इलाक़ा-ए-तन मुझ से छीन ले
aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
कोई 'फ़ज़ा' तो मिले हम को क़ाबिल-ए-परवाज़
अब इन हदों में भला बाल-ओ-पर कहाँ खोलें
दिल से निकल कर देखो तो
क्या आलम है बाहर का
मंज़र दिल ओ निगाह के जब हो गए उदास
ये बे-फ़ज़ा इलाक़ा-ए-तन मुझ से छीन ले