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समलैंगिकता पर शेर

मीर क्या सादे हैं बीमार हुए जिस के सबब

उसी अत्तार के लड़के से दवा लेते हैं

Interpretation: Rekhta AI

यहाँ प्रेम-दुख को बीमारी और राहत को दवा का रूपक बनाकर कहा गया है। मीर अपनी ही भोलेपन पर तंज करते हैं कि जिसने चोट दी, उसी से मरहम की उम्मीद भी कर रहे हैं। “अत्तार का लड़का” संकेत देता है कि मदद उसी ओर से चाही जाती है जहाँ से दर्द मिला था। भाव है: विवश लगाव, आत्म-छल और कड़वी विडंबना।

मीर तक़ी मीर

जो लौंडा छोड़ कर रंडी को चाहे

वो कुइ आशिक़ नहीं है बुल-हवस है

आबरू शाह मुबारक

क्या उस आतिश-बाज़ के लौंडे का इतना शौक़ मीर

बह चली है देख कर उस को तुम्हारी राल कुछ

Interpretation: Rekhta AI

यह शे’र तंज के साथ बताता है कि चाहत इतनी बढ़ गई है कि वह शरीर की हरकत से भी दिखने लगी है। “लार बहना” इच्छा को बहुत खुला और थोड़ा अपमानजनक बना देता है, जैसे संयम ही टूट गया हो। “आतिशबाज़ के लड़के” का ज़िक्र मोहब्बत को सड़क-छाप माहौल से जोड़कर कटाक्ष तेज़ करता है। मुख्य भाव आसक्ति, वासना और लज्जा का मिश्रण है।

मीर तक़ी मीर

हुस्न था तेरा बहुत आलम-फ़रेब

ख़त के आने पर भी इक आलम रहा

Interpretation: Rekhta AI

यहाँ “आलम” का मतलब दुनिया भी है और मन की हालत भी। प्रिय का सौंदर्य ऐसा जादू रचता है कि जैसे एक नई दुनिया बना दे, फिर भी पत्र आने से दूरी पूरी तरह मिटती नहीं। भाव यह है कि संदेश मिलता है, पर तड़प और खालीपन बाकी रहते हैं।

मीर तक़ी मीर

कैफ़िय्यतें अत्तार के लौंडे में बहुत थीं

इस नुस्ख़े की कोई रही हैफ़ दवा याद

Interpretation: Rekhta AI

यह शेर दिखावे और असलियत के फर्क पर व्यंग्य करता है। ‘अत्तार का लड़का’ उन बातों/अदाओं का प्रतीक है जो तुरंत ध्यान खींच लेती हैं, जबकि ‘नुस्ख़े की दवा’ असली समाधान या सार है जो खो जाता है। भाव यह है कि लोग चमक-दमक याद रखते हैं, पर जो सच में राहत दे, उसे भूल जाते हैं।

मीर तक़ी मीर

बाहम हुआ करें हैं दिन रात नीचे ऊपर

ये नर्म-शाने लौंडे हैं मख़मल-ए-दो-ख़्वाबा

Interpretation: Rekhta AI

इस शेर में शारीरिक निकटता को खुलकर कहा गया है। “नीचे-ऊपर” लगातार करवट और मिलन की गति का संकेत देता है, और “मख़मल” स्पर्श की मुलायमियत सुख को दिखाता है। दिन-रात का फैलाव चाहत की तीव्रता और रुक पाने वाली बेचैनी को बढ़ा देता है। भाव-केन्द्र कामुक आकर्षण और देह की कोमलता है।

मीर तक़ी मीर

गर ठहरे मलक आगे उन्हों के तो अजब है

फिरते हैं पड़े दिल्ली के लौंडे जो परी से

Interpretation: Rekhta AI

मीर तक़ी मीर यहाँ सुंदरता और ठाठ का मज़ाकिया बढ़ा-चढ़ाकर वर्णन करते हैं। बात यह है कि आकर्षण इतना है कि फरिश्ते तक ठिठक जाएँ तो अचंभा नहीं। दूसरी पंक्ति में ‘परी’ कहकर दिल्ली के लड़कों की नज़ाकत, सज-धज और इतराहट पर हल्की चुटकी भी है। भाव में हैरानी और शरारत साथ-साथ चलती है।

मीर तक़ी मीर

अमरद-परस्त है तो गुलिस्ताँ की सैर कर

हर नौनिहाल रश्क है याँ ख़ुर्द-साल का

हैदर अली आतिश

याँ तलक ख़ुश हूँ अमारिद से कि रब्ब-ए-करीम

काश दे हूर के बदले भी तू ग़िल्माँ मुझ को

क़ाएम चाँदपुरी

धौला चुके थे मिल कर कल लौंडे मय-कदे के

पर सरगिराँ हो वाइ'ज़ जाता रहा सटक कर

Interpretation: Rekhta AI

यह शेर व्यंग्य करता है कि गलत काम सामने हो रहा है, फिर भी उपदेशक—जो दूसरों को सही-गलत समझाता है—बचकर निकल जाता है। “सरगिराँ” से भाव है कि वह खुद को व्यस्त/बेपरवाह दिखाता है ताकि जवाबदेही आए। “सटक कर” उसकी चोरी-छिपे निकलने वाली चाल को पकड़ता है, और पाखंड कायरता उजागर होती है।

मीर तक़ी मीर

मीर उस क़ाज़ी के लौंडे के लिए आख़िर मुआ

सब को क़ज़िया उस के जीने का था बारे चुक गया

Interpretation: Rekhta AI

इस शे’र में कड़वी विडंबना है कि किसी इंसान का जीवित रहना ही लोगों के लिए विवाद बन जाता है, जैसे उसके जीने पर ही आपत्ति हो। मौत आते ही वही हंगामा अपने-आप शांत हो जाता है और मानो अंतिम फ़ैसला हो जाता है। मीर ने समाज की बेरुख़ी और मौत से मिलने वाले निर्दयी सुकून को उभारा है।

मीर तक़ी मीर

लिया मैं बोसा ब-ज़ोर उस सिपाही-ज़ादे का

अज़ीज़ो अब भी मिरी कुछ दिलावरी देखी

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

हाथ चढ़ जाइयो शैख़ किसू के कभू

लौंडे सब तेरे ख़रीदार हैं मयख़ाने के

Interpretation: Rekhta AI

इस शेर में मीर तक़ी मीर ने शैख़ की दिखावटी परहेज़गारी पर व्यंग्य किया है। “हाथ चढ़ना” पकड़े जाने और बेनक़ाब होने का संकेत है। “मयख़ाना” लालच और वर्जित सुख का रूपक बनता है, और “ख़रीदार” बताता है कि शैख़ की इच्छा उसे आसानी से खरीदा/बहकाया जा सकता है। भाव यह है कि उपदेश देने वाला भी अपनी छिपी चाहतों के आगे कमजोर पड़ जाता है।

मीर तक़ी मीर
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