क़ब्र पर शेर

क़ब्र की तंगी, तारीकी

और उस से वाबस्ता बहुत से भयानक और तकलीफ़-दह तसव्वुरात को शायरी में ख़ूब बर्ता गया है। ये अशआर ज़िदगी में रुक कर सोचने और अपना मुहासिबा करने पर मजबूर करते हैं। हमारा ये इन्तिख़ाब पढ़े और ज़िंदगी की हक़ीक़तों पर ग़ौर कीजिए।

शुक्रिया क़ब्र तक पहुँचाने वालो शुक्रिया

अब अकेले ही चले जाएँगे इस मंज़िल से हम

क़मर जलालवी

मकाँ है क़ब्र जिसे लोग ख़ुद बनाते हैं

मैं अपने घर में हूँ या मैं किसी मज़ार में हूँ

मुनीर नियाज़ी

चराग़ उस ने बुझा भी दिया जला भी दिया

ये मेरी क़ब्र पे मंज़र नया दिखा भी दिया

बशीरुद्दीन अहमद देहलवी

Jashn-e-Rekhta | 2-3-4 December 2022 - Major Dhyan Chand National Stadium, Near India Gate, New Delhi

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