मुझ से क़फ़स का दरवाज़ा क्या टूटेगा
पाँव पड़ी ज़ंजीर में खोई रहती हूँ
सर को क़फ़स पे रक्खे सय्याद कह रहा है
बुलबुल की जान निकला उजड़ा सा आशियाना
गुलशन में अपना कौन था साथी न आशियाँ
रख ली क़फ़स ने आबरू फ़स्ल-ए-बहार में
क़फ़स की चार-दीवारी में अब मैं मुतमइन हूँ
हवादिस साहिब-ए-औलाद भी हो जाएँ तो क्या