मेरी हर शब इसी उम्मीद में कट जाती है
वो अभी आया अभी मेरा मुक़द्दर जागा
दम मोहब्बत का भरा करता था जो दिल वस्ल में
अब वो शाम-ए-हिज्र आते ही पशेमाँ हो गया
वादा-ए-वस्ल न होता तो हम ऐसे भी न थे
कि हमें हिज्र में मरना न गवारा होता
वस्ल का लुत्फ़ शब-ए-हिज्र के मारे यूँ लें
नींद आ जाए जो दोनों को तो ख़्वाबों में मिलें
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टैग्ज़ : तंज़-ओ-मिज़ाहऔर 1 अन्य
मेहंदी में लाली जिस तरह कानों में बाली जिस तरह
जब यूँ मिले तो क्या चले दुनिया का हम पे दाँव रे
मैं चाहता हूँ कोई नक़्श वस्ल का उभरे
ऐ रंग-ए-हुस्न मिरे दिल के कैनवस पे बरस
नूर-ए-सहर-ओ-रंग-ए-सहर पर नहीं मौक़ूफ़
दुश्मन है शब-ए-वस्ल में आवाज़-ए-अज़ाँ तक