बेख़ुद देहलवी के शेर
दिल मोहब्बत से भर गया 'बेख़ुद'
अब किसी पर फ़िदा नहीं होता
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अब किसी पर फ़िदा नहीं होता
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अदाएँ देखने बैठे हो क्या आईने में अपनी
दिया है जिस ने तुम जैसे को दिल उस का जिगर देखो
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जादू है या तिलिस्म तुम्हारी ज़बान में
तुम झूट कह रहे थे मुझे ए'तिबार था
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बात वो कहिए कि जिस बात के सौ पहलू हों
कोई पहलू तो रहे बात बदलने के लिए
व्याख्या
शे’र में जिस बिंदु का वर्णन किया गया है उसी ने इसे दिलचस्प बनाया है। इसमें शब्द बात की यद्यपि तीन बार और पहलू की दो बार पुनरावृत्ति हुई है मगर शब्दों की तुकबंदी और अभिव्यक्ति के प्रवाह की विशेषता ने शे’र में आनंद पैदा किया है। पहलू के अनुरूप शब्द बदलने से शे’र की स्थिति का आभास होता है।
दरअसल शे’र में जिस बिंदु का वर्णन किया गया है, हालांकि इसकी कोई विशेषता नहीं बल्कि सामान्य है मगर जिस अंदाज़ से शायर ने इस बिंदु को व्यक्त किया है वो सरल होने के बावजूद इस बिंदु को दुर्लभ बना देता है।
शे’र का अर्थ यह है कि बात को कुछ ऐसे प्रतीकात्मक ढंग से कहना चाहिए कि इससे सौ तरह के विभिन्न अर्थ निकलते हों। क्योंकि अर्थ की दृष्टि से एकहरी बात कहना बुद्धिमान लोगों की शैली नहीं बल्कि वे एक बात में सौ बिंदुओं का सार व्यक्त करते हैं। इस तरह से सुनने वालों को बहस करने या स्पष्टीकरण मांगने के लिए कोई न कोई पहलू हाथ आजाता है। और जब बात के पहलू प्रचुर हों तो बात बदलने में आसानी होजाती है। अर्थात बिंदु से बिंदु बरामद होता है।
शफ़क़ सुपुरी
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कोई पहलू तो रहे बात बदलने के लिए
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शे’र में जिस बिंदु का वर्णन किया गया है उसी ने इसे दिलचस्प बनाया है। इसमें शब्द बात की यद्यपि तीन बार और पहलू की दो बार पुनरावृत्ति हुई है मगर शब्दों की तुकबंदी और अभिव्यक्ति के प्रवाह की विशेषता ने शे’र में आनंद पैदा किया है। पहलू के अनुरूप शब्द बदलने से शे’र की स्थिति का आभास होता है।
दरअसल शे’र में जिस बिंदु का वर्णन किया गया है, हालांकि इसकी कोई विशेषता नहीं बल्कि सामान्य है मगर जिस अंदाज़ से शायर ने इस बिंदु को व्यक्त किया है वो सरल होने के बावजूद इस बिंदु को दुर्लभ बना देता है।
शे’र का अर्थ यह है कि बात को कुछ ऐसे प्रतीकात्मक ढंग से कहना चाहिए कि इससे सौ तरह के विभिन्न अर्थ निकलते हों। क्योंकि अर्थ की दृष्टि से एकहरी बात कहना बुद्धिमान लोगों की शैली नहीं बल्कि वे एक बात में सौ बिंदुओं का सार व्यक्त करते हैं। इस तरह से सुनने वालों को बहस करने या स्पष्टीकरण मांगने के लिए कोई न कोई पहलू हाथ आजाता है। और जब बात के पहलू प्रचुर हों तो बात बदलने में आसानी होजाती है। अर्थात बिंदु से बिंदु बरामद होता है।
शफ़क़ सुपुरी
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सुन के सारी दास्तान-ए-रंज-ओ-ग़म
कह दिया उस ने कि फिर हम क्या करें
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टैग : तग़ाफ़ुल
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दिल तो लेते हो मगर ये भी रहे याद तुम्हें
जो हमारा न हुआ कब वो तुम्हारा होगा
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टैग : दिल
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राह में बैठा हूँ मैं तुम संग-ए-रह समझो मुझे
आदमी बन जाऊँगा कुछ ठोकरें खाने के बाद
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टैग : आदमी
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आइना देख कर वो ये समझे
मिल गया हुस्न-ए-बे-मिसाल हमें
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मुझ को न दिल पसंद न वो बेवफ़ा पसंद
दोनों हैं ख़ुद-ग़रज़ मुझे दोनों हैं ना-पसंद
मुझ को न दिल पसंद न वो बेवफ़ा पसंद
दोनों हैं ख़ुद-ग़रज़ मुझे दोनों हैं ना-पसंद
हमें पीने से मतलब है जगह की क़ैद क्या 'बेख़ुद'
उसी का नाम जन्नत रख दिया बोतल जहाँ रख दी
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उसी का नाम जन्नत रख दिया बोतल जहाँ रख दी
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वो कुछ मुस्कुराना वो कुछ झेंप जाना
जवानी अदाएँ सिखाती हैं क्या क्या
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न देखना कभी आईना भूल कर देखो
तुम्हारे हुस्न का पैदा जवाब कर देगा
न देखना कभी आईना भूल कर देखो
तुम्हारे हुस्न का पैदा जवाब कर देगा
चश्म-ए-बद-दूर वो भोले भी हैं नादाँ भी हैं
ज़ुल्म भी मुझ पे कभी सोच-समझ कर न हुआ
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हूरों से न होगी ये मुदारात किसी की
याद आएगी जन्नत में मुलाक़ात किसी की
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बात करने की शब-ए-वस्ल इजाज़त दे दो
मुझ को दम भर के लिए ग़ैर की क़िस्मत दे दो
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टैग : इजाज़त
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क़यामत है तिरी उठती जवानी
ग़ज़ब ढाने लगीं नीची निगाहें
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नमक भर कर मिरे ज़ख़्मों में तुम क्या मुस्कुराते हो
मिरे ज़ख़्मों को देखो मुस्कुराना इस को कहते हैं
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मुँह में वाइज़ के भी भर आता है पानी अक्सर
जब कभी तज़्किरा-ए-जाम-ए-शराब आता है
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जब कभी तज़्किरा-ए-जाम-ए-शराब आता है
तुम को आशुफ़्ता-मिज़ाजों की ख़बर से क्या काम
तुम सँवारा करो बैठे हुए गेसू अपने
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सौदा-ए-इश्क़ और है वहशत कुछ और शय
मजनूँ का कोई दोस्त फ़साना-निगार था
सौदा-ए-इश्क़ और है वहशत कुछ और शय
मजनूँ का कोई दोस्त फ़साना-निगार था
दी क़सम वस्ल में उस बुत को ख़ुदा की तो कहा
तुझ को आता है ख़ुदा याद हमारे होते
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दी क़सम वस्ल में उस बुत को ख़ुदा की तो कहा
तुझ को आता है ख़ुदा याद हमारे होते
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सख़्त-जाँ हूँ मुझे इक वार से क्या होता है
ऐसी चोटें कोई दो-चार तो आने दीजे
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बोले वो मुस्कुरा के बहुत इल्तिजा के ब'अद
जी तो ये चाहता है तिरी मान जाइए
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टैग : अदा
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जी तो ये चाहता है तिरी मान जाइए
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झूटा जो कहा मैं ने तो शर्मा के वो बोले
अल्लाह बिगाड़े न बनी बात किसी की
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झूटा जो कहा मैं ने तो शर्मा के वो बोले
अल्लाह बिगाड़े न बनी बात किसी की
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अब आप कोई काम सिखा दीजिए हम को
मालूम हुआ इश्क़ के क़ाबिल तो नहीं हम
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