रिश्ता पर चित्र/छाया शायरी

समाज के दो लोगों के

बीच का तअल्लुक हो या इन्सान और ख़ुदा के दर्मियान रिश्तों की एक डोर हर किसी को बाँधे हुए है। कभी-कभी कुछ रिश्ते ख़ुद-रौ सदाबहार पौधे की तरह हमारे दिलों में उग आते हैं और कभी ता-उम्र इनकी देख भाल करने के बावजूद मुरझा जाते हैं। तअल्लुक़ात की ऐसी ही उतार-चढ़व से भरी कहानियों के कुछ अक्स अशआर की शक्ल में पेश हैं तअल्लुक़ शायरी की मिसाल के तौर परः

सरहदें रोक न पाएँगी कभी रिश्तों को

वो जो हम में तुम में क़रार था तुम्हें याद हो कि न याद हो

दीवारें छोटी होती थीं लेकिन पर्दा होता था

दुश्मनी लाख सही ख़त्म न कीजे रिश्ता

बोलिए