कैसे कहें कि तुझ को भी हम से है वास्ता कोई
तू ने तो हम से आज तक कोई गिला नहीं किया
हम को मिटा सके ये ज़माने में दम नहीं
हम से ज़माना ख़ुद है ज़माने से हम नहीं
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बाज़ीचा-ए-अतफ़ाल है दुनिया मिरे आगे
होता है शब-ओ-रोज़ तमाशा मिरे आगे
Interpretation:
Rekhta AI
मिर्ज़ा ग़ालिब दुनिया को बच्चों के खेल का मैदान कहकर उसकी गंभीरता पर सवाल उठाते हैं, मानो यह सब असल नहीं, बस खेल है। “रात-दिन” का चलना एक लगातार मंच-सा बन जाता है, जिसमें घटनाएँ आती-जाती रहती हैं। भाव-केन्द्र में जीवन से ऊब और दूरी है: कवि भाग नहीं लेता, केवल देखता है।
नहीं दुनिया को जब पर्वा हमारी
तो फिर दुनिया की पर्वा क्यूँ करें हम
सूरज हूँ ज़िंदगी की रमक़ छोड़ जाऊँगा
मैं डूब भी गया तो शफ़क़ छोड़ जाऊँगा
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हम-सफ़र चाहिए हुजूम नहीं
इक मुसाफ़िर भी क़ाफ़िला है मुझे
क्या है जो हो गया हूँ मैं थोड़ा बहुत ख़राब
थोड़ा बहुत ख़राब तो होना भी चाहिए
काश वो रास्ते में मिल जाए
मुझ को मुँह फेर कर गुज़रना है
रास आने लगी दुनिया तो कहा दिल ने कि जा
अब तुझे दर्द की दौलत नहीं मिलने वाली
क्या कहें कितने मरासिम थे हमारे उस से
वो जो इक शख़्स है मुँह फेर के जाने वाला
चाहिए है मुझे इंकार-ए-मोहब्बत मिरे दोस्त
लेकिन इस में तिरा इंकार नहीं चाहिए है
हम ऐसे जाएँगे ले कर बलाएँ दुनिया की
कहीं न होगा कोई हादिसा हमारे बाद
चाहें तो इस को तेग़-ए-ख़मोशी से काट दें
लेकिन जुनूँ से जंग ज़बानी करेंगे हम
मुझे कुरेदने वालो मैं एक सहरा हूँ
कि मुझ से रेत ही निकलेगी आबशार नहीं
पलट के संग तिरी और फेंक सकता हूँ
कि मैं वो क़ैस नहीं हूँ जो मार खा जाए
क्यों इतने मग़रूर हैं 'राही' क्यों इतना इतराते हैं
गंगा तट वीरान न होगा इक उन के उठ जाने से
वो मोहब्बतों के मौसम तुझे याद भी हैं हमदम
मिरा एक बार सुनना तेरा बार बार कहना
इक मोहब्बत है और उस का भी
क्या तमाशा बना रही हूँ मैं
मैं ऐसा सफ़ीना हूँ कि साहिल की सदा पर
तूफ़ान के सीने में उतर जाता हूँ अक्सर
सर-ए-जमशेद को ख़िश्त-ए-ख़ुम-ए-सहबा से टकरा दें
गदा-ए-मय-कदा भी किस क़दर मग़रूर होते हैं
हम को तज्दीद-ए-मुलाक़ात से कब है इंकार
लेकिन अब पहले उन्हें हाथ बढ़ाना होगा
हाथ उलझने लगे जेब-ओ-दामाँ से क्यूँ
ऐ जुनूँ क्या बहारों के दिन आ गए
दिल-ए-ईज़ा-तलब को मुज़्दा-ए-आराम बे-मा'नी
ये वो कश्ती है जो तूफ़ान से टकराई जाती है
तलातुम-ख़ेज़ तूफ़ानों से टकराते रहे हर दम
डुबो दी हम ने ख़ुद कश्ती जूँ-ही साहिल नज़र आया