होंठ पर 20 बेहतरीन शेर
महबूब के लबों की तारीफ़-ओ-तहसीन
और उनसे शिकवे-शिकायत शायरी में आम है। लबों की ख़ूबसूरती और उनकी ना-ज़ुकी के मज़मून को शायेरों ने नए नए दढिंग से बाँधा है । लबों के शेरी बयान में एक पहलू ये भी रहा है कि उन पर एक गहरी चुप पड़ी हुई है, वो हिलते नहीं आशिक़ से बात नहीं करते। ये लब कहीं गुलाब की पंखुड़ी की तरह नाज़ुक हैं तो कहीं उनसे फूल झड़ते हैं। इस मज़मून में और भी कई दिल-चस्प पहलू हैं। हमारा ये इन्तिख़ाब पढ़िए।
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नाज़ुकी उस के लब की क्या कहिए
पंखुड़ी इक गुलाब की सी है
Interpretation:
Rekhta AI
कवि प्रिय के होंठों की कोमल सुंदरता पर मुग्ध है और मानता है कि उसे शब्दों में कहना पूरा नहीं हो पाता। गुलाब की पंखुड़ी की उपमा नर्मी, ताज़गी और नाज़ुकपन का भाव जगाती है। प्रश्नवाचक ढंग प्रशंसा को बढ़ाता है और उस सौंदर्य को अनोखा बताता है।
Interpretation:
Rekhta AI
कवि प्रिय के होंठों की कोमल सुंदरता पर मुग्ध है और मानता है कि उसे शब्दों में कहना पूरा नहीं हो पाता। गुलाब की पंखुड़ी की उपमा नर्मी, ताज़गी और नाज़ुकपन का भाव जगाती है। प्रश्नवाचक ढंग प्रशंसा को बढ़ाता है और उस सौंदर्य को अनोखा बताता है।
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टैग्ज़: फ़ेमस शायरीऔर 1 अन्य
कितने शीरीं हैं तेरे लब कि रक़ीब
गालियाँ खा के बे-मज़ा न हुआ
Interpretation:
Rekhta AI
शायर कहता है कि महबूब के होंठों में इतनी मिठास है कि कड़वी बातें भी मीठी लगती हैं। रक़ीब को जब महबूब ने गालियाँ दीं, तो उसे बुरा लगने के बजाय मज़ा आया क्योंकि वह गालियाँ उन ख़ूबसूरत और मीठे होंठों से निकली थीं। यहाँ अपमान में भी प्रेम का आनंद दिखाया गया है।
Interpretation:
Rekhta AI
शायर कहता है कि महबूब के होंठों में इतनी मिठास है कि कड़वी बातें भी मीठी लगती हैं। रक़ीब को जब महबूब ने गालियाँ दीं, तो उसे बुरा लगने के बजाय मज़ा आया क्योंकि वह गालियाँ उन ख़ूबसूरत और मीठे होंठों से निकली थीं। यहाँ अपमान में भी प्रेम का आनंद दिखाया गया है।
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टैग: लब
सो देख कर तिरे रुख़्सार ओ लब यक़ीं आया
कि फूल खिलते हैं गुलज़ार के अलावा भी
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टैग्ज़: रुख़्सारऔर 1 अन्य
सिर्फ़ उस के होंट काग़ज़ पर बना देता हूँ मैं
ख़ुद बना लेती है होंटों पर हँसी अपनी जगह
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मिल गए थे एक बार उस के जो मेरे लब से लब
'उम्र भर होंटों पे अपने मैं ज़बाँ फेरा किया
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जिस लब के ग़ैर बोसे लें उस लब से 'शेफ़्ता'
कम्बख़्त गालियाँ भी नहीं मेरे वास्ते
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टैग: किस
आता है जी में साक़ी-ए-मह-वश पे बार बार
लब चूम लूँ तिरा लब-ए-पैमाना छोड़ कर
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लब-ए-नाज़ुक के बोसे लूँ तो मिस्सी मुँह बनाती है
कफ़-ए-पा को अगर चूमूँ तो मेहंदी रंग लाती है
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ब-वक़्त-ए-बोसा-ए-लब काश ये दिल कामराँ होता
ज़बाँ उस बद-ज़बाँ की मुँह में और मैं ज़बाँ होता