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रद करें डाउनलोड शेर

दर्द पर 20 मशहूर शेर

ज़िन्दगी की कड़वी सच्चाई

कईं बार दर्द की सूरत में बाहर निकलती है.l शायरी दर्द की अवस्था को न सिर्फ दिशा देता है बल्कि ऐसे समय में हमें स्थिरता भी प्रदान करता है ताकि ज़िन्दगी की निरंतर संघर्ष सहज हो l

टॉप 20 सीरीज़

इश्क़ से तबीअत ने ज़ीस्त का मज़ा पाया

दर्द की दवा पाई दर्द-ए-बे-दवा पाया

इश्क़ (प्रेम) की वजह से ही मेरे स्वभाव को जीवन का असली आनंद मिला।

मुझे दर्द की दवा तो मिल गई, लेकिन साथ ही एक ऐसा दर्द मिला जिसका कोई इलाज नहीं है।

इश्क़ (प्रेम) की वजह से ही मेरे स्वभाव को जीवन का असली आनंद मिला।

मुझे दर्द की दवा तो मिल गई, लेकिन साथ ही एक ऐसा दर्द मिला जिसका कोई इलाज नहीं है।

मिर्ज़ा ग़ालिब

ख़ंजर चले किसी पे तड़पते हैं हम 'अमीर'

सारे जहाँ का दर्द हमारे जिगर में है

अमीर मीनाई

अब तो ख़ुशी का ग़म है ग़म की ख़ुशी मुझे

बे-हिस बना चुकी है बहुत ज़िंदगी मुझे

शकील बदायूनी

दोस्तों को भी मिले दर्द की दौलत या रब

मेरा अपना ही भला हो मुझे मंज़ूर नहीं

हफ़ीज़ जालंधरी

बे-नाम सा ये दर्द ठहर क्यूँ नहीं जाता

जो बीत गया है वो गुज़र क्यूँ नहीं जाता

निदा फ़ाज़ली

अब ये भी नहीं ठीक कि हर दर्द मिटा दें

कुछ दर्द कलेजे से लगाने के लिए हैं

जाँ निसार अख़्तर

आज तो दिल के दर्द पर हँस कर

दर्द का दिल दुखा दिया मैं ने

ज़ुबैर अली ताबिश

रहा दिल में वो बेदर्द और दर्द रहा

मुक़ीम कौन हुआ है मक़ाम किस का था

मेरे दिल में वह निर्दयी प्रिय नहीं रहा, बस दर्द रह गया।

कौन यहाँ हमेशा टिकता है, यह जगह भला किसकी थी?

मेरे दिल में वह निर्दयी प्रिय नहीं रहा, बस दर्द रह गया।

कौन यहाँ हमेशा टिकता है, यह जगह भला किसकी थी?

दाग़ देहलवी

दर्द हो दिल में तो दवा कीजे

और जो दिल ही हो तो क्या कीजे

मंज़र लखनवी

कुछ दर्द की शिद्दत है कुछ पास-ए-मोहब्बत है

हम आह तो करते हैं फ़रियाद नहीं करते

फ़ना निज़ामी कानपुरी

आदत के ब'अद दर्द भी देने लगा मज़ा

हँस हँस के आह आह किए जा रहा हूँ मैं

जिगर मुरादाबादी

दर्द-ए-दिल कितना पसंद आया उसे

मैं ने जब की आह उस ने वाह की

आसी ग़ाज़ीपुरी

जब कि पहलू से यार उठता है

दर्द बे-इख़्तियार उठता है

जैसे ही प्रिय मेरे बगल से उठकर हटता है,

वैसे ही दिल का दर्द अपने-आप, बिना रोक-टोक बढ़ उठता है।

जैसे ही प्रिय मेरे बगल से उठकर हटता है,

वैसे ही दिल का दर्द अपने-आप, बिना रोक-टोक बढ़ उठता है।

मीर तक़ी मीर

दिल सरापा दर्द था वो इब्तिदा-ए-इश्क़ थी

इंतिहा ये है कि 'फ़ानी' दर्द अब दिल हो गया

फ़ानी बदायुनी

हाल तुम सुन लो मिरा देख लो सूरत मेरी

दर्द वो चीज़ नहीं है कि दिखाए कोई

जलील मानिकपूरी

मिरे लबों का तबस्सुम तो सब ने देख लिया

जो दिल पे बीत रही है वो कोई क्या जाने

इक़बाल सफ़ी पूरी

अब तो ये भी नहीं रहा एहसास

दर्द होता है या नहीं होता

जिगर मुरादाबादी

यारो नए मौसम ने ये एहसान किए हैं

अब याद मुझे दर्द पुराने नहीं आते

बशीर बद्र

ग़म में कुछ ग़म का मशग़ला कीजे

दर्द की दर्द से दवा कीजे

मंज़र लखनवी

हाथ रख रख के वो सीने पे किसी का कहना

दिल से दर्द उठता है पहले कि जिगर से पहले

हफ़ीज़ जालंधरी
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