ज़िंदगी पर शेर
ज़िंदगी को परिभाषित करना
मुहाल है । शायद इसलिए शाइर ज़िंदगी को जितने ज़ावियों और सूरतों में देखता है, उस को अपने तौर पर पेश करता है । ज़िंदगी के हुस्न की कहानी हो या उस की बद-सूरती का बयान सब को उर्दू शाइरी अपने दामन में समेट कर चलती है । इस का अंदाज़ा यहाँ प्रस्तुत संकलन से लगाया जा सकता है ।
जो गुज़ारी न जा सकी हम से
हम ने वो ज़िंदगी गुज़ारी है
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उम्र-ए-दराज़ माँग के लाई थी चार दिन
दो आरज़ू में कट गए दो इंतिज़ार में
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होश वालों को ख़बर क्या बे-ख़ुदी क्या चीज़ है
इश्क़ कीजे फिर समझिए ज़िंदगी क्या चीज़ है
सैर कर दुनिया की ग़ाफ़िल ज़िंदगानी फिर कहाँ
ज़िंदगी गर कुछ रही तो ये जवानी फिर कहाँ
ज़िंदगी किस तरह बसर होगी
दिल नहीं लग रहा मोहब्बत में
ले दे के अपने पास फ़क़त इक नज़र तो है
क्यूँ देखें ज़िंदगी को किसी की नज़र से हम
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ज़िंदगी तू ने मुझे क़ब्र से कम दी है ज़मीं
पाँव फैलाऊँ तो दीवार में सर लगता है
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ज़िंदगी ज़िंदा-दिली का है नाम
मुर्दा-दिल ख़ाक जिया करते हैं
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क़ैद-ए-हयात ओ बंद-ए-ग़म अस्ल में दोनों एक हैं
मौत से पहले आदमी ग़म से नजात पाए क्यूँ
Interpretation:
Rekhta AI
ग़ालिब का कहना है कि ज़िंदगी और दुःख अलग-अलग नहीं हैं, बल्कि दोनों का वजूद एक ही है। जब तक इंसान ज़िंदा है, वह दुःख की गिरफ़्त में रहेगा क्योंकि जीवन स्वयं एक जेल के समान है। दुःख से पूरी तरह आज़ादी केवल मृत्यु के बाद ही संभव है, जीते-जी सुख की उम्मीद करना व्यर्थ है।
ज़िंदगी क्या है अनासिर में ज़ुहूर-ए-तरतीब
मौत क्या है इन्हीं अज्ज़ा का परेशाँ होना
EXPLANATION #1
चकबस्त का ये शे’र बहुत मशहूर है। ग़ालिब ने क्या ख़ूब कहा था;
हो गए मुज़्महिल क़ुवा ग़ालिब
अब अनासिर में एतिदाल कहाँ
मानव शरीर की रचना कुछ तत्वों से होती है। दार्शनिकों की दृष्टि में वो तत्व अग्नि, वायु, मिट्टी और जल हैं। इन तत्वों में जब भ्रम पैदा होता है तो मानव शरीर अपना संतुलन खो देता है। अर्थात ग़ालिब की भाषा में जब तत्वों में संतुलन नहीं रहता तो इंद्रियाँ अर्थात विभिन्न शक्तियां कमज़ोर होजाती हैं। चकबस्त इसी तथ्य की तरफ़ इशारा करते हैं कि जब तक मानव शरीर में तत्व क्रम में हैं मनुष्य जीवित रहता है। और जब ये तत्व परेशान हो जाते हैं अर्थात उनमें संतुलन और सामंजस्य नहीं रहता है तो मृत्यु होजाती है।
शफ़क़ सुपुरी
मौत का भी इलाज हो शायद
ज़िंदगी का कोई इलाज नहीं
Interpretation:
Rekhta AI
यह शेर उलटी-सी लगने वाली सच्चाई कहता है: मौत के लिए तो शायद कोई हल सोच लिया जाए, पर जीवन की उलझन, बेचैनी और दर्द का पूरा इलाज नहीं। यहाँ “इलाज” दवा से ज़्यादा राहत और छुटकारे का संकेत है। भाव में थकान, असहायता और जीवन की कठोरता का अनुभव झलकता है।
देखा है ज़िंदगी को कुछ इतने क़रीब से
चेहरे तमाम लगने लगे हैं अजीब से
तुम मोहब्बत को खेल कहते हो
हम ने बर्बाद ज़िंदगी कर ली
ज़िंदगी क्या किसी मुफ़लिस की क़बा है जिस में
हर घड़ी दर्द के पैवंद लगे जाते हैं
धूप में निकलो घटाओं में नहा कर देखो
ज़िंदगी क्या है किताबों को हटा कर देखो
ज़िंदगी शायद इसी का नाम है
दूरियाँ मजबूरियाँ तन्हाइयाँ
ग़रज़ कि काट दिए ज़िंदगी के दिन ऐ दोस्त
वो तेरी याद में हों या तुझे भुलाने में
Interpretation:
Rekhta AI
यह शेर बताता है कि जीवन का समय एक ही बात में खर्च हो गया—कभी याद में, कभी भूलने के प्रयास में। याद करना और भूलना अलग लगते हैं, पर दोनों में मन उसी व्यक्ति के इर्द-गिर्द घूमता रहता है। “कट गए” से दिन काटने का दर्द और थकान झलकती है। भावनात्मक सार यह है कि बिछोह ने जीने को संघर्ष बना दिया।
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अब तो ख़ुशी का ग़म है न ग़म की ख़ुशी मुझे
बे-हिस बना चुकी है बहुत ज़िंदगी मुझे
कुछ इस तरह से गुज़ारी है ज़िंदगी जैसे
तमाम उम्र किसी दूसरे के घर में रहा
ज़िंदगी है या कोई तूफ़ान है!
हम तो इस जीने के हाथों मर चले
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यूँ तो मरने के लिए ज़हर सभी पीते हैं
ज़िंदगी तेरे लिए ज़हर पिया है मैं ने
ये माना ज़िंदगी है चार दिन की
बहुत होते हैं यारो चार दिन भी
Interpretation:
Rekhta AI
यह शेर जीवन की छोटी अवधि को “चार दिन” कहकर मानता है, पर साथ ही बताता है कि इतना-सा समय भी अनुभवों और भावनाओं से भर जाता है। दुख, सुख, इंतज़ार और यादें मिलकर इन “चार दिनों” को भारी बना देती हैं। “दोस्तों” कहकर कवि इसे अपनापन और समझ के साथ कहता है।
यही है ज़िंदगी कुछ ख़्वाब चंद उम्मीदें
इन्हीं खिलौनों से तुम भी बहल सको तो चलो
इक मुअम्मा है समझने का न समझाने का
ज़िंदगी काहे को है ख़्वाब है दीवाने का
मैं ज़िंदगी का साथ निभाता चला गया
हर फ़िक्र को धुएँ में उड़ाता चला गया
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टैग्ज़ : फ़ेमस शायरीऔर 1 अन्य
हर नफ़स उम्र-ए-गुज़िश्ता की है मय्यत 'फ़ानी'
ज़िंदगी नाम है मर मर के जिए जाने का
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इस तरह ज़िंदगी ने दिया है हमारा साथ
जैसे कोई निबाह रहा हो रक़ीब से
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टैग्ज़ : फ़ेमस शायरीऔर 1 अन्य
किस तरह जमा कीजिए अब अपने आप को
काग़ज़ बिखर रहे हैं पुरानी किताब के
गँवाई किस की तमन्ना में ज़िंदगी मैं ने
वो कौन है जिसे देखा नहीं कभी मैं ने
कम से कम मौत से ऐसी मुझे उम्मीद नहीं
ज़िंदगी तू ने तो धोके पे दिया है धोका
Interpretation:
Rekhta AI
यहाँ वक्ता मौत को सीधी और तय मानता है—वह आती है तो अंत कर देती है, छल नहीं करती। शिकायत जीवन से है, जो भरोसा और आशा देकर बार-बार तोड़ता है और हर बार नए रूप में धोखा देता है। भाव-केन्द्र में मोहभंग और गहरी पीड़ा है।
मुझे ज़िंदगी की दुआ देने वाले
हँसी आ रही है तिरी सादगी पर
दर्द ऐसा है कि जी चाहे है ज़िंदा रहिए
ज़िंदगी ऐसी कि मर जाने को जी चाहे है
तू कहानी ही के पर्दे में भली लगती है
ज़िंदगी तेरी हक़ीक़त नहीं देखी जाती
हम ग़म-ज़दा हैं लाएँ कहाँ से ख़ुशी के गीत
देंगे वही जो पाएँगे इस ज़िंदगी से हम
'मीर' अमदन भी कोई मरता है
जान है तो जहान है प्यारे
Interpretation:
Rekhta AI
यह दोहा उदासी और टूटन के सामने जीवन को बचाने की बात करता है। “जान” यहाँ सबसे बड़ा सहारा है और “जहान” उसका अर्थ—यानी मौके, रिश्ते और आगे का रास्ता। कवि प्रेम से समझाता है कि जीते रहोगे तो सब कुछ फिर से संभव हो सकता है।
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टैग्ज़ : प्रसिद्ध मिसरेऔर 1 अन्य
मुसीबत और लम्बी ज़िंदगानी
बुज़ुर्गों की दुआ ने मार डाला
यूँ ज़िंदगी गुज़ार रहा हूँ तिरे बग़ैर
जैसे कोई गुनाह किए जा रहा हूँ मैं
गर ज़िंदगी में मिल गए फिर इत्तिफ़ाक़ से
पूछेंगे अपना हाल तिरी बेबसी से हम
जो लोग मौत को ज़ालिम क़रार देते हैं
ख़ुदा मिलाए उन्हें ज़िंदगी के मारों से
माँ की आग़ोश में कल मौत की आग़ोश में आज
हम को दुनिया में ये दो वक़्त सुहाने से मिले
ज़िंदगी क्या है आज इसे ऐ दोस्त
सोच लें और उदास हो जाएँ
Interpretation:
Rekhta AI
कवि दोस्त से कहता है कि जीवन का मतलब आज ही टटोल कर देखो। जब हम जीवन की नश्वरता और अधूरापन साफ़ समझते हैं, तो मन में एक शांत-सी उदासी उतर आती है। यहाँ सोच-विचार ही सच्चाई से सामना है, और वही सच्चाई भारी लगती है।
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टैग : फ़ेमस शायरी
है अजीब शहर की ज़िंदगी न सफ़र रहा न क़याम है
कहीं कारोबार सी दोपहर कहीं बद-मिज़ाज सी शाम है
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टैग्ज़ : मकैनिकल लाइफ़और 1 अन्य
बहाने और भी होते जो ज़िंदगी के लिए
हम एक बार तिरी आरज़ू भी खो देते
यही ज़िंदगी मुसीबत यही ज़िंदगी मसर्रत
यही ज़िंदगी हक़ीक़त यही ज़िंदगी फ़साना
इश्क़ को एक उम्र चाहिए और
उम्र का कोई ए'तिबार नहीं