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रद करें डाउनलोड शेर

अदा पर 20 बेहतरीन शेर

हुस्न अदाओं से ही हुस्न

बनता है और यही अदाएं आशिक़ के लिए जान-लेवा होती है। महबूब के देखने मुस्कुराने, चलने, बात करने और ख़ामोश रहने की अदाओं का बयान शायरी का एक अहम हिस्सा है। हाज़िर है अदा शायरी की एक हसीन झलक।

टॉप 20 सीरीज़

इस सादगी पे कौन मर जाए ख़ुदा

लड़ते हैं और हाथ में तलवार भी नहीं

Interpretation: Rekhta AI

शायर अपने महबूब के इस अंदाज़ पर हैरान है कि वह बिना किसी हथियार के ही लड़ने चला आया है। यहाँ 'लड़ना' नज़रों के वार या अदाओं का प्रतीक है, जो तलवार से भी ज़्यादा घातक हैं। ग़ालिब कहते हैं कि इस 'सादगी' पर मर मिटना लाज़मी है, जहाँ कातिल यह नहीं जानता कि उसकी सुंदरता ही सबसे बड़ा हथियार है।

Interpretation: Rekhta AI

शायर अपने महबूब के इस अंदाज़ पर हैरान है कि वह बिना किसी हथियार के ही लड़ने चला आया है। यहाँ 'लड़ना' नज़रों के वार या अदाओं का प्रतीक है, जो तलवार से भी ज़्यादा घातक हैं। ग़ालिब कहते हैं कि इस 'सादगी' पर मर मिटना लाज़मी है, जहाँ कातिल यह नहीं जानता कि उसकी सुंदरता ही सबसे बड़ा हथियार है।

मिर्ज़ा ग़ालिब

अंदाज़ अपना देखते हैं आइने में वो

और ये भी देखते हैं कोई देखता हो

निज़ाम रामपुरी

पूछा जो उन से चाँद निकलता है किस तरह

ज़ुल्फ़ों को रुख़ पे डाल के झटका दिया कि यूँ

आरज़ू लखनवी

हया से सर झुका लेना अदा से मुस्कुरा देना

हसीनों को भी कितना सहल है बिजली गिरा देना

अकबर इलाहाबादी

पहले इस में इक अदा थी नाज़ था अंदाज़ था

रूठना अब तो तिरी आदत में शामिल हो गया

आग़ा शाइर क़ज़लबाश

ये जो सर नीचे किए बैठे हैं

जान कितनों की लिए बैठे हैं

जलील मानिकपूरी

निगाहें इस क़दर क़ातिल कि उफ़ उफ़

अदाएँ इस क़दर प्यारी कि तौबा

आरज़ू लखनवी

जान लेनी थी साफ़ कह देते

क्या ज़रूरत थी मुस्कुराने की

अज्ञात

अदा से देख लो जाता रहे गिला दिल का

बस इक निगाह पे ठहरा है फ़ैसला दिल का

असद अली ख़ान क़लक़

आफ़त तो है वो नाज़ भी अंदाज़ भी लेकिन

मरता हूँ मैं जिस पर वो अदा और ही कुछ है

अमीर मीनाई

आप ने तस्वीर भेजी मैं ने देखी ग़ौर से

हर अदा अच्छी ख़मोशी की अदा अच्छी नहीं

जलील मानिकपूरी

गुल हो महताब हो आईना हो ख़ुर्शीद हो मीर

अपना महबूब वही है जो अदा रखता हो

Interpretation: Rekhta AI

कवि कहता है कि बाहरी सुंदरता कई रूपों में मिलती है—फूल की ताज़गी, चाँद की शीतल रोशनी, आईने की चमक, सूरज का तेज़। लेकिन किसी को ‘प्रिय’ बनाने वाली चीज़ केवल रूप नहीं, बल्कि ‘अदा’ है: व्यवहार की नज़ाकत, बोलने-चलने का ढंग और मन को खींच लेने वाली मिठास। इसी अदा से सुंदरता में जान जाती है।

Interpretation: Rekhta AI

कवि कहता है कि बाहरी सुंदरता कई रूपों में मिलती है—फूल की ताज़गी, चाँद की शीतल रोशनी, आईने की चमक, सूरज का तेज़। लेकिन किसी को ‘प्रिय’ बनाने वाली चीज़ केवल रूप नहीं, बल्कि ‘अदा’ है: व्यवहार की नज़ाकत, बोलने-चलने का ढंग और मन को खींच लेने वाली मिठास। इसी अदा से सुंदरता में जान जाती है।

मीर तक़ी मीर

अंगड़ाई भी वो लेने पाए उठा के हाथ

देखा जो मुझ को छोड़ दिए मुस्कुरा के हाथ

निज़ाम रामपुरी

ज़माना हुस्न नज़ाकत बला जफ़ा शोख़ी

सिमट के गए सब आप की अदाओं में

कालीदास गुप्ता रज़ा

नाज़ है गुल को नज़ाकत पे चमन में 'ज़ौक़'

उस ने देखे ही नहीं नाज़-ओ-नज़ाकत वाले

Interpretation: Rekhta AI

शायर कहता है कि गुलाब का अपनी कोमलता पर इतराना बेकार है। यह घमंड केवल इसलिए है क्योंकि उसने अब तक महबूब की असली सुंदरता और नज़ाकत को नहीं देखा है। महबूब के सामने फूल की कोमलता कुछ भी नहीं है।

Interpretation: Rekhta AI

शायर कहता है कि गुलाब का अपनी कोमलता पर इतराना बेकार है। यह घमंड केवल इसलिए है क्योंकि उसने अब तक महबूब की असली सुंदरता और नज़ाकत को नहीं देखा है। महबूब के सामने फूल की कोमलता कुछ भी नहीं है।

शेख़ इब्राहीम ज़ौक़

नमाज़ अपनी अगरचे कभी क़ज़ा हुई

अदा किसी की जो देखी तो फिर अदा हुई

अब्दुल रहमान एहसान देहलवी

ख़ूब-रू हैं सैकड़ों लेकिन नहीं तेरा जवाब

दिलरुबाई में अदा में नाज़ में अंदाज़ में

लाला माधव राम जौहर

सूरत तो इब्तिदा से तिरी ला-जवाब थी

नाज़-ओ-अदा ने और तरह-दार कर दिया

जलील मानिकपूरी

तुझ को देखा तिरे नाज़-ओ-अदा को देखा

तेरी हर तर्ज़ में इक शान-ए-ख़ुदा को देखा

मिर्ज़ा मायल देहलवी

दुश्मन के घर से चल के दिखा दो जुदा जुदा

ये बाँकपन की चाल ये नाज़-ओ-अदा की है

बेख़ुद देहलवी
बोलिए