वैलेंटाइन डे पर शेर
इस ख़ूबसूरत काव्य-संग्रह
में इश्क़ के हर रंग, हर भाव और हर एहसास को अभिव्यक्त करने वाले शेरों को जमा किया गया है.आप इन्हें पढ़िए और इश्क़ करने वालों के बीच साझा कीजिए.
ये इश्क़ नहीं आसाँ इतना ही समझ लीजे
इक आग का दरिया है और डूब के जाना है
उस की याद आई है साँसो ज़रा आहिस्ता चलो
धड़कनों से भी इबादत में ख़लल पड़ता है
मोहब्बत में नहीं है फ़र्क़ जीने और मरने का
उसी को देख कर जीते हैं जिस काफ़िर पे दम निकले
प्रेम में जीना और मरना अलग नहीं लगता, दोनों एक जैसे हो जाते हैं।
हम उसी को देखकर जीते हैं जिसके रूखेपन से हमारी सांस छूट सकती है।
इस शेर में प्रेम की चरम अवस्था दिखाई गई है, जहाँ जीवन और मृत्यु का भेद मिट जाता है। प्रेमी की जिंदगी का सहारा प्रिय का दर्शन है, लेकिन वही प्रिय इतना कठोर/उदासीन है कि उसी के कारण जान भी जा सकती है। एक ही चेहरा जीवन भी देता है और मृत्यु भी—यही तड़प और समर्पण का भाव है।
अच्छा ख़ासा बैठे बैठे गुम हो जाता हूँ
अब मैं अक्सर मैं नहीं रहता तुम हो जाता हूँ
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होश वालों को ख़बर क्या बे-ख़ुदी क्या चीज़ है
इश्क़ कीजे फिर समझिए ज़िंदगी क्या चीज़ है
इश्क़ पर ज़ोर नहीं है ये वो आतिश 'ग़ालिब'
कि लगाए न लगे और बुझाए न बने
इश्क़ पर किसी का बस नहीं चलता; उसे ज़बरदस्ती न किया जा सकता है, न रोका जा सकता है।
ग़ालिब कहते हैं यह ऐसी आग है जो चाहो तब भी न लगे, और लग जाए तो बुझती नहीं।
इस शे’र में इश्क़ को ऐसी आग बताया गया है जो इंसान की मरज़ी से नहीं चलती। न आप इसे अपने हिसाब से जगा सकते हैं, न जगे हुए इश्क़ को आसानी से बुझा सकते हैं। भाव यह है कि प्यार भीतर से जलाता है और आदमी को बेबस कर देता है।
चुपके चुपके रात दिन आँसू बहाना याद है
हम को अब तक आशिक़ी का वो ज़माना याद है
करूँगा क्या जो मोहब्बत में हो गया नाकाम
मुझे तो और कोई काम भी नहीं आता
कोई समझे तो एक बात कहूँ
इश्क़ तौफ़ीक़ है गुनाह नहीं
अगर कोई सही तरह समझ सके, तो मैं एक बात कह दूँ।
इश्क़ पाप नहीं, ईश्वर की दी हुई कृपा है।
कवि कहता है कि यह बात हर किसी को नहीं समझ आती, इसलिए वह केवल समझदार से बोलता है। वह प्रेम को दोष और पाप मानने के बजाय उसे ‘तौफ़ीक़’ यानी ऊपर से मिली शक्ति/कृपा बताता है। इस तरह प्रेम पर लगने वाले नैतिक आरोपों को वह पलट देता है और उसे ऊँचा, पवित्र अनुभव बनाता है। भाव यह है कि प्रेम को दंड नहीं, आदर मिलना चाहिए।
तिरे इश्क़ की इंतिहा चाहता हूँ
मिरी सादगी देख क्या चाहता हूँ
मैं तुम्हारे प्रेम की आख़िरी सीमा तक पहुँचना चाहता हूँ।
मेरा भोलेपन तो देखो, मैं क्या माँग रहा हूँ।
यहाँ बोलने वाला प्रेम का थोड़ा-सा नहीं, उसका चरम चाहता है। दूसरी पंक्ति में वह अपनी ही चाह की बड़ी माँग को ‘भोलेपन’ कहकर मान लेता है। “अंत” या “सीमा” पूर्णता और पूरी तरह समर्पित होने का संकेत है, और “भोलेपन” में हल्की-सी आत्म-विडंबना भी है। भाव-केन्द्र ललक, भक्ति और विनम्रता है।
तुम को आता है प्यार पर ग़ुस्सा
मुझ को ग़ुस्से पे प्यार आता है
यारो कुछ तो ज़िक्र करो तुम उस की क़यामत बाँहों का
वो जो सिमटते होंगे उन में वो तो मर जाते होंगे
दिल में किसी के राह किए जा रहा हूँ मैं
कितना हसीं गुनाह किए जा रहा हूँ मैं
जो कहा मैं ने कि प्यार आता है मुझ को तुम पर
हँस के कहने लगा और आप को आता क्या है
जब भी आता है मिरा नाम तिरे नाम के साथ
जाने क्यूँ लोग मिरे नाम से जल जाते हैं
सब लोग जिधर वो हैं उधर देख रहे हैं
हम देखने वालों की नज़र देख रहे हैं
सब लोग उसी ओर देख रहे हैं जहाँ वो खड़े/मौजूद हैं।
मैं उन्हें नहीं, देखने वालों की नज़र को देख रहा हूँ।
यह शेर बताता है कि वक्ता की दिलचस्पी सिर्फ़ महबूब में नहीं, बल्कि लोगों की निगाहों में भी है। भीड़ तो महबूब को देख रही है, पर वक्ता उन नज़रों में छुपी चाह, जलन और खिंचाव को पकड़ता है। इससे महबूब की कशिश के साथ-साथ मुकाबले का एहसास भी उभरता है। भाव में सतर्कता और हल्की-सी ईर्ष्या झलकती है।
आइना देख के कहते हैं सँवरने वाले
आज बे-मौत मरेंगे मिरे मरने वाले
आईना देखकर सजने-सँवरने वाले यह बात कहते हैं।
आज जो लोग मेरी मौत चाहते हैं, वे खुद ही बेवक्त टूटकर मरेंगे।
यह शेर अपनी ख़ूबसूरती/रुतबे पर तंज़ भरे घमंड का इज़हार है। बोलने वाला कहता है कि जो लोग उसे नुकसान पहुँचाना या मरता देखना चाहते हैं, वे ईर्ष्या और जलन में खुद ही भीतर से खत्म हो जाएँगे। “बे-मौत मरना” यहाँ असली मौत नहीं, बल्कि जलन से घुटने और हार मान लेने का रूपक है। भाव में चुनौती और कटाक्ष है।
झुकी झुकी सी नज़र बे-क़रार है कि नहीं
दबा दबा सा सही दिल में प्यार है कि नहीं
पत्थर मुझे कहता है मिरा चाहने वाला
मैं मोम हूँ उस ने मुझे छू कर नहीं देखा
कुछ तो हवा भी सर्द थी कुछ था तिरा ख़याल भी
दिल को ख़ुशी के साथ साथ होता रहा मलाल भी
इक लफ़्ज़-ए-मोहब्बत का अदना ये फ़साना है
सिमटे तो दिल-ए-आशिक़ फैले तो ज़माना है
याद रखना ही मोहब्बत में नहीं है सब कुछ
भूल जाना भी बड़ी बात हुआ करती है
आख़री हिचकी तिरे ज़ानूँ पे आए
मौत भी मैं शाइराना चाहता हूँ
मैं जब सो जाऊँ इन आँखों पे अपने होंट रख देना
यक़ीं आ जाएगा पलकों तले भी दिल धड़कता है
वस्ल का दिन और इतना मुख़्तसर
दिन गिने जाते थे इस दिन के लिए
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शब-ए-विसाल है गुल कर दो इन चराग़ों को
ख़ुशी की बज़्म में क्या काम जलने वालों का
यह मिलन की रात है, इन दीयों को बुझा दो।
ख़ुशी की महफ़िल में तड़पते-जलते लोगों का क्या काम है?
कवि कहता है कि मिलन की रात में दीपक बुझा दो, क्योंकि उस घड़ी में उजाले से ज़्यादा निकटता और एकांत चाहिए। “जलने वाले” उन प्रेमियों का रूपक हैं जो विरह की आग में तड़पते हैं। आनंद की सभा में उनका दर्द बेमेल लगता है, इसलिए शेर में व्यंग्य के साथ अलग-थलग पड़ने का भाव भी है।
आशिक़ी से मिलेगा ऐ ज़ाहिद
बंदगी से ख़ुदा नहीं मिलता
ऐ ज़ाहिद, जो चीज़ तुम ढूँढते हो वह प्रेम से मिलेगी।
केवल भक्ति और बाहरी पूजा से ईश्वर नहीं मिलता।
यह शेर प्रेम और रूखी धार्मिकता के बीच फर्क दिखाता है। कवि ज़ाहिद से कहता है कि सिर्फ नियमों वाली पूजा-पाठ पर्याप्त नहीं, अगर दिल में सच्ची लगन न हो। ईश्वर तक पहुँचने का असल रास्ता भीतर की गर्माहट, प्रेम और समर्पण है।
कौन सी बात है तुम में ऐसी
इतने अच्छे क्यूँ लगते हो
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मैं चाहता था कि उस को गुलाब पेश करूँ
वो ख़ुद गुलाब था उस को गुलाब क्या देता
लोग काँटों से बच के चलते हैं
मैं ने फूलों से ज़ख़्म खाए हैं
आते आते मिरा नाम सा रह गया
उस के होंटों पे कुछ काँपता रह गया
ज़िंदगी यूँही बहुत कम है मोहब्बत के लिए
रूठ कर वक़्त गँवाने की ज़रूरत क्या है
क्या कहूँ तुम से मैं कि क्या है इश्क़
जान का रोग है बला है इश्क़
मैं तुमसे कैसे कहूँ कि इश्क़ असल में क्या है?
इश्क़ जान का रोग है, एक बड़ी मुसीबत है।
मीर तक़ी मीर के यहाँ इश्क़ को समझाना भी कठिन है, क्योंकि यह साधारण भावना नहीं बल्कि बहुत गहरा अनुभव है। वे इश्क़ को “रोग” और “बला” कहकर बताते हैं कि यह मन-बहलाव नहीं, जीवन तक को पकड़ लेने वाली पीड़ा है। यह रूपक इश्क़ की तीव्रता और इंसान की बेबसी को सामने लाता है। भाव का केंद्र दर्द भरी सच्चाई और भीतर का डर-सा है।
बेचैन इस क़दर था कि सोया न रात भर
पलकों से लिख रहा था तिरा नाम चाँद पर
मोहब्बत एक ख़ुशबू है हमेशा साथ चलती है
कोई इंसान तन्हाई में भी तन्हा नहीं रहता
इलाज अपना कराते फिर रहे हो जाने किस किस से
मोहब्बत कर के देखो ना मोहब्बत क्यूँ नहीं करते
दिल पे आए हुए इल्ज़ाम से पहचानते हैं
लोग अब मुझ को तिरे नाम से पहचानते हैं
अंगड़ाई भी वो लेने न पाए उठा के हाथ
देखा जो मुझ को छोड़ दिए मुस्कुरा के हाथ
हँस के फ़रमाते हैं वो देख के हालत मेरी
क्यूँ तुम आसान समझते थे मोहब्बत मेरी
इश्क़ मुझ को नहीं वहशत ही सही
मेरी वहशत तिरी शोहरत ही सही
अगर तुम मेरे जज़्बातों को इश्क़ नहीं मानते, तो चलो इसे मेरा पागलपन ही मान लेते हैं।
लेकिन याद रखो, मेरा यही पागलपन दुनिया में तुम्हारी प्रसिद्धि और चर्चा का कारण बन रहा है।
शायर कहता है कि अगर दुनिया या महबूब उसके प्यार को इज़्ज़त देने के बजाय उसे 'वहशत' (पागलपन) कहते हैं, तो उसे यह भी मंज़ूर है। लेकिन साथ ही वह यह भी जताता है कि उसी के इस दीवानेपन के कारण महबूब का नाम हर जगह मशहूर हो रहा है। यह शेर इश्क़ में मिट जाने और महबूब को ऊँचा उठाने की भावना को दर्शाता है।
उसे किसी से मोहब्बत न थी मगर उस ने
गुलाब तोड़ के दुनिया को शक में डाल दिया
जब तुम से मोहब्बत की हम ने तब जा के कहीं ये राज़ खुला
मरने का सलीक़ा आते ही जीने का शुऊर आ जाता है
ये तो कहिए इस ख़ता की क्या सज़ा
मैं जो कह दूँ आप पर मरता हूँ मैं
बताइए, इस गलती की सज़ा क्या होगी?
अगर मैं कह दूँ कि मैं आपसे बेइंतहा प्यार करता हूँ।
कवि प्यार के इकरार को ‘गलती’ कहकर मज़ाकिया ढंग से उसकी सज़ा पूछता है। इसमें स्वीकार करने की चाह भी है और ठुकराए जाने का डर भी। ‘मैं आप पर मरता हूँ’ प्यार की तीव्रता का बढ़ा-चढ़ाकर कहा गया रूप है, जो दिल की बेबसी और लगाव दोनों दिखाता है।
सिर्फ़ उस के होंट काग़ज़ पर बना देता हूँ मैं
ख़ुद बना लेती है होंटों पर हँसी अपनी जगह
एक कमी थी ताज-महल में
मैं ने तिरी तस्वीर लगा दी
तुम फिर उसी अदा से अंगड़ाई ले के हँस दो
आ जाएगा पलट कर गुज़रा हुआ ज़माना
इस तअल्लुक़ में नहीं मुमकिन तलाक़
ये मोहब्बत है कोई शादी नहीं
आज भी शायद कोई फूलों का तोहफ़ा भेज दे
तितलियाँ मंडला रही हैं काँच के गुल-दान पर
चाहत का जब मज़ा है कि वो भी हों बे-क़रार
दोनों तरफ़ हो आग बराबर लगी हुई