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ग़म पर शेर

ग़म हमारी ज़िंदगी का एक

अनिवार्य रंग है और इस को कई तरह से स्थायित्व हासिल है । हालाँकि ख़ुशी भी हमारी ज़िंदगी का ही एक रंग है लेकिन इस को उस तरह से स्थायित्व हासिल नहीं है । उर्दू शायरी में ग़म-ए-दौराँ, ग़म-ए-जानाँ, ग़म-ए-इश्क़, गम-ए-रोज़गार जैसे शब्द-संरचना या मिश्रित शब्द-संरचना का प्रयोग अधिक होता है । उर्दू शायरी का ये रूप वास्तव में ज़िंदगी का एक दुखद वर्णन है । विरह या जुदाई सिर्फ़ आशिक़ का अपने माशूक़ से भौतिक-सुख या शारीरिक स्पर्श का न होना ही नहीं बल्कि इंसान की बद-नसीबी / महरूमी का रूपक है हमारा यह चयन ग़म और दुख के व्यापक क्षेत्र की एक सैर है।

दिल ना-उमीद तो नहीं नाकाम ही तो है

लम्बी है ग़म की शाम मगर शाम ही तो है

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

कर रहा था ग़म-ए-जहाँ का हिसाब

आज तुम याद बे-हिसाब आए

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

सारी दुनिया के ग़म हमारे हैं

और सितम ये कि हम तुम्हारे हैं

जौन एलिया

अपने चेहरे से जो ज़ाहिर है छुपाएँ कैसे

तेरी मर्ज़ी के मुताबिक़ नज़र आएँ कैसे

वसीम बरेलवी

क़ैद-ए-हयात बंद-ए-ग़म अस्ल में दोनों एक हैं

मौत से पहले आदमी ग़म से नजात पाए क्यूँ

Interpretation: Rekhta AI

ग़ालिब का कहना है कि ज़िंदगी और दुःख अलग-अलग नहीं हैं, बल्कि दोनों का वजूद एक ही है। जब तक इंसान ज़िंदा है, वह दुःख की गिरफ़्त में रहेगा क्योंकि जीवन स्वयं एक जेल के समान है। दुःख से पूरी तरह आज़ादी केवल मृत्यु के बाद ही संभव है, जीते-जी सुख की उम्मीद करना व्यर्थ है।

मिर्ज़ा ग़ालिब

ग़म और ख़ुशी में फ़र्क़ महसूस हो जहाँ

मैं दिल को उस मक़ाम पे लाता चला गया

साहिर लुधियानवी

अब तो ख़ुशी का ग़म है ग़म की ख़ुशी मुझे

बे-हिस बना चुकी है बहुत ज़िंदगी मुझे

शकील बदायूनी

मेरी क़िस्मत में ग़म गर इतना था

दिल भी या-रब कई दिए होते

Interpretation: Rekhta AI

शायर ईश्वर से शिकायत कर रहा है कि अगर उसके भाग्य में दुखों का अंबार ही लिखना था, तो उन्हें सहने के लिए सिर्फ एक दिल क्यों दिया? एक अकेला और नाज़ुक दिल इतने सारे गम नहीं झेल सकता। इसलिए दुख की मात्रा के हिसाब से उसे कई दिल मिलने चाहिए थे ताकि वह यह सारा बोझ उठा पाता।

मिर्ज़ा ग़ालिब

ज़माने भर के ग़म या इक तिरा ग़म

ये ग़म होगा तो कितने ग़म होंगे

हफ़ीज़ होशियारपुरी

ग़म-ए-दुनिया भी ग़म-ए-यार में शामिल कर लो

नश्शा बढ़ता है शराबें जो शराबों में मिलें

अहमद फ़राज़

ग़म मुझे देते हो औरों की ख़ुशी के वास्ते

क्यूँ बुरे बनते हो तुम नाहक़ किसी के वास्ते

रियाज़ ख़ैराबादी

पत्थर के जिगर वालो ग़म में वो रवानी है

ख़ुद राह बना लेगा बहता हुआ पानी है

बशीर बद्र

ग़म-ए-ज़िंदगी हो नाराज़

मुझ को आदत है मुस्कुराने की

अब्दुल हमीद अदम

तुम इतना जो मुस्कुरा रहे हो

क्या ग़म है जिस को छुपा रहे हो

कैफ़ी आज़मी

इस क़दर मुसलसल थीं शिद्दतें जुदाई की

आज पहली बार उस से मैं ने बेवफ़ाई की

अहमद फ़राज़

मुसीबत और लम्बी ज़िंदगानी

बुज़ुर्गों की दुआ ने मार डाला

मुज़्तर ख़ैराबादी

ग़म-ए-हस्ती का 'असद' किस से हो जुज़ मर्ग इलाज

शम्अ हर रंग में जलती है सहर होते तक

Interpretation: Rekhta AI

इस शेर में जीवन के दुख को ऐसा दर्द माना गया है जो जीते-जी पूरी तरह खत्म नहीं होता; उसका अंतिम अंत मौत ही है। दीपक/शमा इंसान की जिंदगी का रूपक है, जो अलग-अलग हालात में भी जलती रहती है। ‘सुबह’ यहाँ अंत का संकेत है, जब जलना रुक जाता है। भाव में कड़वाहट के साथ एक तरह की स्वीकृति और ठहराव है।

मिर्ज़ा ग़ालिब

मैं रोना चाहता हूँ ख़ूब रोना चाहता हूँ मैं

फिर उस के बाद गहरी नींद सोना चाहता हूँ मैं

फ़रहत एहसास

उन का ग़म उन का तसव्वुर उन की याद

कट रही है ज़िंदगी आराम से

महशर इनायती

इक इश्क़ का ग़म आफ़त और उस पे ये दिल आफ़त

या ग़म दिया होता या दिल दिया होता

चराग़ हसन हसरत

जब तुझे याद कर लिया सुब्ह महक महक उठी

जब तिरा ग़म जगा लिया रात मचल मचल गई

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

ग़म है अब ख़ुशी है उम्मीद है यास

सब से नजात पाए ज़माने गुज़र गए

ख़ुमार बाराबंकवी

ये ग़म नहीं है कि हम दोनों एक हो सके

ये रंज है कि कोई दरमियान में भी था

जमाल एहसानी

ग़म अगरचे जाँ-गुसिल है कहाँ बचें कि दिल है

ग़म-ए-इश्क़ गर होता ग़म-ए-रोज़गार होता

Interpretation: Rekhta AI

इस शेर में ग़ालिब कहते हैं कि दिल होना ही दुख की संभावना है, इसलिए दुख से बचना मुश्किल है। वे प्रेम के दुख को सांसारिक चिंताओं के दुख से तुलना करके दिखाते हैं। प्रेम का दुख तीखा है, पर उसमें एक तरह की गरिमा और अर्थ है; वरना आदमी बस रोज़मर्रा की परेशानियों में घिसता रहता। मतलब यह कि दुख टलता नहीं, बस उसका रूप बदल जाता है।

मिर्ज़ा ग़ालिब

सुकून दे सकीं राहतें ज़माने की

जो नींद आई तिरे ग़म की छाँव में आई

पयाम फ़तेहपुरी

क्या कहूँ किस तरह से जीता हूँ

ग़म को खाता हूँ आँसू पीता हूँ

सैय्यद मोहम्मद मीर असर

एक वो हैं कि जिन्हें अपनी ख़ुशी ले डूबी

एक हम हैं कि जिन्हें ग़म ने उभरने दिया

आज़ाद गुलाटी

तुझ को पा कर भी कम हो सकी बे-ताबी-ए-दिल

इतना आसान तिरे इश्क़ का ग़म था ही नहीं

Interpretation: Rekhta AI

यह शेर बताता है कि मिलन से भी प्रेम की बेचैनी खत्म नहीं होती। दिल की बेचैनी यहाँ उस चाह की निशानी है जो पाने के बाद भी शांत नहीं पड़ती। भाव यह है कि प्रेम का दुःख गहरा और टिकाऊ होता है, उसे आसानी से हल नहीं किया जा सकता।

फ़िराक़ गोरखपुरी

इलाही एक ग़म-ए-रोज़गार क्या कम था

कि इश्क़ भेज दिया जान-ए-मुब्तला के लिए

हफ़ीज़ जालंधरी

अरे आसमाँ वाले बता इस में बुरा क्या है

ख़ुशी के चार झोंके गर इधर से भी गुज़र जाएँ

साहिर लुधियानवी

अगर मौजें डुबो देतीं तो कुछ तस्कीन हो जाती

किनारों ने डुबोया है मुझे इस बात का ग़म है

दिवाकर राही

हम को किस के ग़म ने मारा ये कहानी फिर सही

किस ने तोड़ा दिल हमारा ये कहानी फिर सही

मसरूर अनवर

उन का ग़म उन का तसव्वुर उन के शिकवे अब कहाँ

अब तो ये बातें भी दिल हो गईं आई गई

साहिर लुधियानवी

अश्क-ए-ग़म दीदा-ए-पुर-नम से सँभाले गए

ये वो बच्चे हैं जो माँ बाप से पाले गए

मीर अनीस

ग़म से बिखरा पाएमाल हुआ

मैं तो ग़म से ही बे-मिसाल हुआ

हसन नईम

मुझे ख़बर नहीं ग़म क्या है और ख़ुशी क्या है

ये ज़िंदगी की है सूरत तो ज़िंदगी क्या है

अहसन मारहरवी

ग़म की तौहीन कर ग़म की शिकायत कर के

दिल रहे या रहे अज़मत-ए-ग़म रहने दे

क़मर मुरादाबादी

जम्अ' हम ने किया है ग़म दिल में

इस का अब सूद खाए जाएँगे

जौन एलिया

मिरी ज़िंदगी पे मुस्कुरा मुझे ज़िंदगी का अलम नहीं

जिसे तेरे ग़म से हो वास्ता वो ख़िज़ाँ बहार से कम नहीं

शकील बदायूनी

'अज़ीम लोग थे टूटे तो इक वक़ार के साथ

किसी से कुछ कहा बस उदास रहने लगे

इक़बाल अशहर

ग़म में कुछ ग़म का मशग़ला कीजे

दर्द की दर्द से दवा कीजे

मंज़र लखनवी

दर्द ग़म दिल की तबीअत बन गए

अब यहाँ आराम ही आराम है

जिगर मुरादाबादी

ग़म है आवारा अकेले में भटक जाता है

जिस जगह रहिए वहाँ मिलते-मिलाते रहिए

निदा फ़ाज़ली

ग़म-ए-दिल अब किसी के बस का नहीं

क्या दवा क्या दुआ करे कोई

हादी मछलीशहरी

दिल गया रौनक़-ए-हयात गई

ग़म गया सारी काएनात गई

जिगर मुरादाबादी

ये ग़म क्या दिल की 'आदत है नहीं तो

किसी से कुछ शिकायत है नहीं तो

जौन एलिया

ग़मों से बैर था सो हम ने ख़ुद-कुशी कर ली

शजर गिरा के परिंदों से इंतिक़ाम लिया

बालमोहन पांडेय

ज़िंदगी कितनी मसर्रत से गुज़रती या रब

ऐश की तरह अगर ग़म भी गवारा होता

अख़्तर शीरानी

हज़ार तरह के थे रंज पिछले मौसम में

पर इतना था कि कोई साथ रोने वाला था

जमाल एहसानी

कौन किसी का ग़म खाता है

कहने को ग़म-ख़्वार है दुनिया

मोहम्मद रफ़ी सौदा
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