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aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair

jis ke hote hue hote the zamāne mere

रद करें डाउनलोड शेर

बिजली पर शेर

आसमान में कड़कने वाली

बिजली को उसकी अपनी तीव्रता, कर्कश और तेज़ चमक के गुणों के आधार पर कई सूरतों में रूपक के तौर पर इस्तेमाल किया गया है। बिजली का कौंधना प्रेमिका का मुस्काराना भी है। इसमें भी वही चमक और जला देने की वही तीव्रता होती है और उसके भाँती हिज्र भोग रहे आशिक़ के नालों से भी है। शाएरी में बिजली का विषय कई और अनिवार्यता के साथ आया है। उसमें आशियाँ और ख़िर्मन मूल अनिवार्यता हैं. बिजली की मूल भूमिका आशियाँ और खिर्मन को जलाना है। इन शब्दों से स्थापित होने वाला मज़मून किसी एक सतह पर ठहरा नहीं रहता बल्कि उसकी व्याख्या और समझने के अनगिनत स्तर हैं।

इधर फ़लक को है ज़िद बिजलियाँ गिराने की

उधर हमें भी है धुन आशियाँ बनाने की

अज्ञात

डरता हूँ आसमान से बिजली गिर पड़े

सय्याद की निगाह सू-ए-आशियाँ नहीं

Interpretation: Rekhta AI

यहाँ कवि बताता है कि मन अक्सर गलत दिशा में डरता है: ऊपर से गिरती बिजली जैसी अनहोनी का भय, और दूसरी ओर वह शिकारी जिससे डर माना जाता है, पर उसकी नज़र घोंसले पर नहीं। “बिजली” अचानक आने वाली किस्मत की मार का संकेत है और “घोंसला” नाज़ुक घर/सुरक्षा का। भाव यह है कि चिंता हमें बड़े, दूर के खतरे दिखाती है और असली स्थिति धुंधली रह जाती है।

मोमिन ख़ाँ मोमिन

बिजली चमकी तो अब्र रोया

याद गई क्या हँसी किसी की

गोया फ़क़ीर मोहम्मद

क़फ़स की तीलियों में जाने क्या तरकीब रक्खी है

कि हर बिजली क़रीब-ए-आशियाँ मालूम होती है

सीमाब अकबराबादी

मुमकिन नहीं चमन में दोनों की ज़िद हो पूरी

या बिजलियाँ रहेंगी या आशियाँ रहेगा

अज्ञात

अब बिजलियों का ख़ौफ़ भी दिल से निकल गया

ख़ुद मेरा आशियाँ मिरी आहों से जल गया

अज्ञात

लहू से मैं ने लिखा था जो कुछ दीवार-ए-ज़िंदाँ पर

वो बिजली बन के चमका दामन-ए-सुब्ह-ए-गुलिस्ताँ पर

सीमाब अकबराबादी

फ़रेब-ए-रौशनी में आने वालो मैं कहता था

कि बिजली आशियाने की निगहबाँ हो नहीं सकती

शफ़ीक़ जौनपुरी

उट्ठा जो अब्र दिल की उमंगें चमक उठीं

लहराईं बिजलियाँ तो मैं लहरा के पी गया

एहसान दानिश कांधलवी

तड़प जाता हूँ जब बिजली चमकती देख लेता हूँ

कि इस से मिलता-जुलता सा किसी का मुस्कुराना है

ग़ुलाम मुर्तज़ा कैफ़ काकोरी

ये अब्र है या फ़ील-ए-सियह-मस्त है साक़ी

बिजली के जो है पाँव में ज़ंजीर हवा पर

शाह नसीर

ज़ब्त-ए-नाला से आज काम लिया

गिरती बिजली को मैं ने थाम लिया

जलील मानिकपूरी

बिजली गिरेगी सेहन-ए-चमन में कहाँ कहाँ

किस शाख़-ए-गुलिस्ताँ पे मिरा आशियाँ नहीं

सलाम संदेलवी

बर्क़ ने मेरा नशेमन जलाया हो कहीं

सहन-ए-गुलशन में उजाला है ख़ुदा ख़ैर करे

ख़लिश अकबराबादी

अज़ल से सोख़्ता-सामाँ हूँ फ़िक्र-ए-आशियाँ क्या हो

गिरती बर्क़ तो ये सोज़-ए-दिल से जल गया होता

अब्बास अली ख़ान बेखुद

क़फ़स से आशियाँ तब्दील करना बात ही क्या थी

हमें देखो कि हम ने बिजलियों से आशियाँ बदला

महज़र लखनवी

देख कर बर्क़ की परेशानी

आशियाँ ख़ुद ही फूँक डाला है

ख़ुमार बाराबंकवी

कहीं गिरी तो है बिजली ज़रा नज़र कीजे

किसी ग़रीब की पलटी हुई दुआ तो नहीं

कलीम अहमदाबादी

कोई रश्क-ए-हुस्न-ए-तमाम था वही क़द्द-ओ-क़ामत-ए-सर्व सा

वही बर्क़ जिस का बयाँ हो क्या जो गिरी तो दिल में उतर गई

रिज़्वानुल्लाह
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